वेदी तेरी पर माँ, हम क्या शीश नवाएँ?

तेरे चरणों पर माँ, हम क्या फूल चढ़ाएँ?

हाथों में है खड्ग हमारे, लौह-मुकुट है सिर पर-

पूजा को ठहरें या समर-क्षेत्र को जाएँ?

मन्दिर तेरे में माँ, हम क्या दीप जगाएँ?

कैसे तेरी प्रतिमा की हम ज्योति बढ़ाएँ?

शत्रु रक्त की प्यासी है यह ढाल हमारी दीपक-

आरति को ठहरें या रण-प्रांगण में जाएँ?

दिल्ली जेल, सितम्बर, 1931

विकल्प – अज्ञेय

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