Posted on: July 7, 2021 Posted by: लिटरेचर इन इंडिया Comments: 0
केदारनाथ सिंह

केदारनाथ सिंह

केदारनाथ सिंह (७ जुलाई १९३4 – १९ मार्च २०१८), हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि व साहित्यकार थे। वे अज्ञेय द्वारा सम्पादित तीसरा सप्तक के कवि रहे। भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा उन्हें वर्ष २०१३ का ४९वां ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया था। वे यह पुरस्कार पाने वाले हिन्दी के १०वें लेखक थे।

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केदारनाथ सिंह का जन्म ७ जुलाई १९३४ ई॰ को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के चकिया गाँव में हुआ था। उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से १९५६ ई॰ में हिन्दी में एम॰ए॰ और १९६४ में पी-एच॰ डी॰ की उपाधि प्राप्त की। उनका निधन १९ मार्च २०१८ को दिल्ली में उपचार के दौरान हुआ। कुछ वक़्त गोरखपुर में हिंदी के प्रध्यापक रहे। उन्होंने जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में भारतीय भाषा केंद्र में बतौर आचार्य और अध्यक्ष काम किया था।

केदारनाथ सिंह की प्रमुख काव्य कृतियां ‘जमीन पक रही है’, ‘यहां से देखो’, ‘उत्तर कबीर’, ‘टालस्टॉय और साइकिल’ और ‘बाघ’ हैं। उनकी प्रमुख गद्य कृतियां ‘कल्पना और छायावाद’, ‘आधुनिक हिंदी कविता में बिंबविधान’ और ‘मेरे समय के शब्द’ हैं।

केदारनाथ सिंह की मुख्य कृतियाँ

कविता संग्रह
 
  • अभी बिल्कुल अभी (1960)
  • जमीन पक रही है(1980)
  • यहाँ से देखो(1983)
  • बाघ(1996),(पुस्तक के रूप में)
  • अकाल में सारस(1988)
  • उत्तर कबीर और अन्य कविताएँ(1995)
  • तालस्ताय और साइकिल(2005)
  • सृष्टि पर पहरा (2014)
आलोचना
 
  • कल्पना और छायावाद
  • आधुनिक हिंदी कविता में बिंबविधान
  • मेरे समय के शब्द
  • मेरे साक्षात्कार
संपादन
 
  • ताना-बाना (आधुनिक भारतीय कविता से एक चयन)
  • समकालीन रूसी कविताएँ
  • कविता दशक
  • साखी (अनियतकालिक पत्रिका)
  • शब्द (अनियतकालिक पत्रिका)[6]

पुरस्कार

1989 में उनकी कृति ‘अकाल में सारस’ को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था। इसके अलावा उन्हें व्यास सम्मान, मध्य प्रदेश का मैथिलीशरण गुप्त सम्मान, उत्तर प्रदेश का भारत-भारती सम्मान, बिहार का दिनकर सम्मान तथा केरल का कुमार आशान सम्मान मिला था। वर्ष 2013 में उन्हें प्रतिष्ठित ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। इस पुरस्कार से सम्मानित होने वाले वह हिन्दी के १०वें साहित्यकार थे।

केदारनाथ सिंह की 5 श्रेष्ठ कविताएं

मुझे विश्वास है

यह पृथ्वी रहेगी

यदि और कहीं नहीं तो मेरी हड्डियों में

यह रहेगी जैसे पेड़ के तने में

रहते हैं दीमक

जैसे दाने में रह लेता है घुन

यह रहेगी प्रलय के बाद भी मेरे अंदर

यदि और कहीं नहीं तो मेरी जबान

और मेरी नश्वरता में

यह रहेगी

और एक सुबह मैं उठूँगा

मैं उठूँगा पृथ्वी-समेत

जल और कच्छप-समेत मैं उठूँगा

मैं उठूँगा और चल दूँगा उससे मिलने

जिससे वादा है

कि मिलूँगा।

 

दुपहरिया…

 

झरने लगे नीम के पत्ते बढ़ने लगी उदासी मन की,

उड़ने लगी बुझे खेतों से

झुर-झुर सरसों की रंगीनी,

धूसर धूप हुई मन पर ज्यों-

सुधियों की चादर अनबीनी,

दिन के इस सुनसान पहर में रुक-सी गई प्रगति जीवन की ।

साँस रोक कर खड़े हो गए

लुटे-लुटे-से शीशम उन्मन,

चिलबिल की नंगी बाँहों में

भरने लगा एक खोयापन,

बड़ी हो गई कटु कानों को ‘चुर-मुर’ ध्वनि बाँसों के वन की ।

थक कर ठहर गई दुपहरिया,

रुक कर सहम गई चौबाई,

आँखों के इस वीराने में-

और चमकने लगी रुखाई,

प्रान, आ गए दर्दीले दिन, बीत गईं रातें ठिठुरन की ।

 

अंत महज एक मुहावरा है

 

अंत में मित्रों,

इतना ही कहूंगा

कि अंत महज एक मुहावरा है

जिसे शब्द हमेशा

अपने विस्फोट से उड़ा देते हैं

और बचा रहता है हर बार

वही एक कच्चा-सा

आदिम मिट्टी जैसा ताजा आरंभ

जहां से हर चीज

फिर से शुरू हो सकती है

 

छोटे शहर की एक दोपहर

 

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हजारों घर, हजारों चेहरों-भरा सुनसान

बोलता है, बोलती है जिस तरह चट्टान

सलाखों से छन रही है दोपहर की धूप

धूप में रखा हुआ है एक काला सूप

तमतमाए हुए चेहरे, खुले खाली हाथ

देख लो वे जा रहे हैं उठे जर्जर माथ

शब्द सारे धूल हैं, व्याकरण सारे ढोंग

किस कदर खामोश हैं चलते हुए वे लोग

पियाली टूटी पड़ी है, गिर पड़ी है चाय

साइकिल की छाँह में सिमटी खड़ी है गाय

पूछता है एक चेहरा दूसरे से मौन

बचा हो साबूत-ऐसा कहाँ है वह – कौन?

सिर्फ कौआ एक मँडराता हुआ-सा व्यर्थ

समूचे माहौल को कुछ दे रहा है अर्थ

 

खोल दूं यह आज का दिन

 

खोल दूं यह आज का दिन

जिसे-

मेरी देहरी के पास कोई रख गया है,

एक हल्दी-रंगे

ताजे

दूर देशी पत्र-सा।

थरथराती रोशनी में,

हर संदेशे की तरह

यह एक भटका संदेश भी

अनपढा ही रह न जाए-

सोचता हूँ

खोल दूं।

इस सम्पुटित दिन के सुनहले पत्र-को

जो द्वार पर गुमसुम पडा है,

खोल दूं।

पर, एक नन्हा-सा

किलकता प्रश्न आकर

हाथ मेरा थाम लेता है,

कौन जाने क्या लिखा हो?

(कौन जाने अंधेरे में- दूसरे का पत्र मेरे द्वारा कोई रख गया हो)

कहीं तो लिखा नहीं है

नाम मेरा,

पता मेरा,

आह! कैसे खोल दूं।

हाथ,

जिसने द्वार खोला,

क्षितिज खोले

दिशाएं खोलीं,

न जाने क्यों इस महकते

मूक, हल्दी-रंगे, ताजे,

किरण-मुद्रित संदेशे को

खोलने में कांपता है।

साभार- कविताकोश

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