Posted on: December 25, 2022 Posted by: लिटरेचर इन इंडिया Comments: 0
कन्हैयालाल नंदन Kanhaiyalal Nandan

डाक्टर कन्हैयालाल नंदन (१ जुलाई १९३३ – २५ सितम्बर १०१०) हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार, मंचीय कवि और गीतकार थे। पराग, सारिका और दिनमान जैसी पत्रिकाओं में बतौर संपादक अपनी छाप छोड़ने वाले नंदन ने कई किताबें भी लिखीं। कन्हैयालाल नंदन को भारत सरकार के पद्मश्री पुरस्कार के अलावा भारतेन्दु पुरस्कार और नेहरू फेलोशिप पुरस्कार से भी नवाजा गया।

 

कन्हैयालाल नंदन का जीवन

 

उनका जन्म उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के एक गांव परसदेपुर में हुआ। उन्होने डी.ए.वी.कालेज, कानपुर से बी.ए, प्रयाग विश्वविद्यालय, इलाहाबाद से एम.ए और भावनगर विश्वविद्यालय से पीएच.डी. की।

चार वर्षों तक बंबई विश्वविद्यालय, बंबई से संलग्न कालेजों में हिंदी-अध्यापन के बाद १९६१ से १९७२ तक वे टाइम्स ऑफ इंडिया प्रकाशन समूह के ‘धर्मयुग’ में सहायक संपादक रहे। १९७२ से दिल्ली में क्रमश: ’पराग’, ‘सारिका’ और दिनमान के संपादक रहे। तीन वर्ष दैनिक नवभारत टाइम्स में फीचर सम्पादन किया। छ: वर्ष तक हिंदी ‘संडे मेल’ में प्रधान संपादक रह चुकने के बाद १९९५ से ‘इंडसइंड मीडिया’ में डायरेक्टर रहे।

 

कन्हैयालाल नंदन की रचनाएँ

उनकी डेढ़ दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित जिनमें ‘लुकुआ का शाहनामा’, ‘घाट-घाट का पानी’, ‘अंतरंग’, नाट्य-परिवेश’, ‘आग के रंग’, ‘अमृता शेरगिल, ’समय की दहलीज’, ‘ज़रिया-

नजरिया’ और ‘गीत संचयन’ बहुचर्चित और प्रशंसित है।

 

कन्हैयालाल नंदन को सम्मान

 

डाक्टर कन्हैयालाल नंदन अनेकानेक पुरस्कारों के साथ साहित्य में अवदान के लिये ‘परिवार-पुरस्कार’ से पुरस्कृत,’पद्मश्री’ से अलंकृत और नेहरू फेलोशिप से सम्मानित है।

 

कन्हैयालाल नंदन का निधन

कन्हैयालाल नंदन का निधन २५ सितंबर २०१० को दिल्ली के निजी अस्पताल में निधन हो गया। निधन के समय वे 77 वर्ष के थे।

 

 

कन्हैयालाल नंदन- ‘नदी की कहानी कभी फिर सुनाना, मैं प्यासा हूं दो घूंट पानी पिलाना’

 

“बहुमुखी प्रतिभा के धनी कन्हैयालाल नंदन की आज जयंती है. उनका जन्म 1 जुलाई, 1933 को उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के गांव परसदेपुर में हुआ था. हिंदी के वरिष्ठ पत्रकार, आलोचक, कहानीकार, उपन्यासकार, कवि और कुशल संपादक थे कन्हैयालाल. पराग, सारिका और दिनमान जैसी पत्रिकाओं में बतौर संपादक अपनी छाप छोड़ने वाले नंदनजी ने कई किताबें भी लिखीं. उनकी प्रतिभा और लेखन के लिए कन्हैयालाल नंदन को ‘पद्मश्री पुरस्कार’, ‘भारतेन्दु पुरस्कार’ और ‘नेहरू फेलोशिप’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया.

कन्हैयाजी ने कानपुर के डीएवी कॉलेज बीए और इलाहाबाद के प्रयाग विश्वविद्यालय से एमए और भावनगर विश्वविद्यालय से पीएच.डी. की उपाधि हासिल की.

चार वर्षों तक बंबई विश्वविद्यालय के कॉलेजों में हिंदी-अध्यापन के बाद 1961 से 1972 तक वे टाइम्स ऑफ इंडिया प्रकाशन समूह के ‘धर्मयुग’ में सहायक संपादक रहे. इसके बाद वे ‘पराग’, ‘सारिका’ और ‘दिनमान’ जैसी प्रसिद्ध पत्रिकाओं के संपादक रहे. कई वर्षों तक नवभारत टाइम्स में फीचर सम्पादन किया. हिंदी ‘संडे मेल’ के भी वे 6 वर्षों तक प्रधान संपादक रहे. बाद में वह ‘इंडसइंड मीडिया’ में निदेशक बन गए.

 

प्रसिद्ध लेखक और पत्रकार अवेधश श्रीवास्तव उनके बारे में अपने अनुभव साझा करते हुए बताते हैं कि कन्हैयाजी कमलेश्वर जी के सहयोगी रहे, उनके साथ रहे, इसलिए उन्होंने भी कमलेश्वर की तरह ही नए रचनाकारों को बहुत उत्साह दिया और उनकी रचनाओं को प्रकाशित किया.

 

अवधेश श्रीवास्तव ने बताया कि जब वे ‘सारिका’ के संपादक बने तो उन्होंने नए-नए रचानाकारों को पत्रिका में स्थान दिया. उन्होंने बताया कि उनकी कहानी ‘आवाज’ को कन्हैयाजी ने ही ‘सारिका’ में प्रकाशित किया था. उस समय ‘सारिका’ में छपना किसी भी लेखक के लिए सम्मान की बात हुआ करती थी. उन्होंने ‘सारिका’ को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया.

 

आग के धर्म को रेखांकित करने वाले कन्हैयालाल नंदन अपने धर्म के भी बहुत पक्के थे. अवधेश श्रीवास्तव बताते हैं कि व्यक्तिगत संबंध अलग होते हैं और एक संपादक के संबंध अलग होते हैं. यह विशेषता कन्हैयाजी के व्यक्तित्व और उनके कार्य में स्पष्ट दिखाई देती थी. वे अपने घनिष्ठों की रचनाओं को वापस भेज देते थे और उनमें संशोधन की सलाह देते थे. वे बताते थे कि किस प्रकार से यह रचना और प्रभावशाली हो सकती है. वे संशोधन के बाद रचना को अपने पत्र-पत्रिका में स्थान देते थे.

 

अंगारे को तुम ने छुआ और हाथ में फफोला नहीं हुआ
इतनी सी बात पर अंगारे पर तोहमत ना लगाओ
जरा तह तक जाओ
आग भी कभी-कभी अपना धर्म निभाती है
और जलने वाले की क्षमता देख कर जलाती है

नंदनजी ने अपने रचना और संपादनकाल में तमाम नए लेखकों और पत्रकार को प्रत्साहन देकर आगे बढ़ाने का काम किया. अवधेश श्रीवास्तव बताते हैं कि उनमें एक ही नजर में सामने वाले के व्यक्तित्व को समझने की बढ़ी गजब की क्षमता थी. कौन सा व्यक्ति उनके पास किस काम से आया है, वह फौरन ही ताड़ जाते और उसकी जरूरत के हिसाब से मदद भी करते. सबसे पहले जरूरतमंद व्यक्ति की जरूरत को पूरा करना उनकी प्रतिभा थी. ‘मैं प्यासा हूं दो घूंट पानी पिलाना’ के माध्यम से उनका यह गुण अच्छी तरह से समझा जा सकता है.

नदी की कहानी कभी फिर सुनाना,
मैं प्यासा हूं दो घूंट पानी पिलाना।

मुझे वो मिलेगा ये मुझ को यकीं है
बड़ा जानलेवा है ये दरमियाना।

मुहब्बत का अंजाम हरदम यही था
भंवर देखना कूदना डूब जाना।

अभी मुझ से फिर आप से फिर किसी से
मियां ये मुहब्बत है या कारखाना।

ये तन्हाइयां, याद भी, चान्दनी भी,
गजब का वजन है सम्भलके उठाना।

 

आज वरिष्ठ लेखकों और पत्रकार की जमात में खड़े न जाने कितने ऐसे लोग हैं, जिनको कन्हैयालाल नंदन ने स्वतंत्र उड़ने के लिए खुला आसमान दिया. अवधेश श्रीवास्तव पुराने दिनों को याद करते बताते हैं कि चूंकि कन्हैयाजी कानपुर के थे, और उन्हें अपनी मिट्टी से खास लगाव था, इसलिए उन्होंने कानपुर के कई लेखकों और पत्रकारों को अपनी प्रतिभा निखारने और उन्हें मुकम्मल जगह तक पहुंचाने का काम किया. उनके व्यक्तित्व के इस गुण को उनकी एक रचना में साफ-साफ देखा जा सकता है-

हर सुबह को कोई दोपहर चाहिए,
मैं परिंदा हूं उड़ने को पर चाहिए।

मैंने मांगी दुआएं, दुआएं मिलीं
उन दुआओं का मुझपे असर चाहिए।

जिसमें रहकर सुकूं से गुजारा करूं
मुझको अहसास का ऐसा घर चाहिए।

जिंदगी चाहिए मुझको मानी भरी, (मानी-सार्थक)
चाहे कितनी भी हो मुख्तसर, चाहिए।

लाख उसको अमल में न लाऊं कभी,
शानोशौकत का सामां मगर चाहिए।

जब मुसीबत पड़े और भारी पड़े,
तो कहीं एक तो चश्मेतर चाहिए। (चश्मेतर-नम आंख)

कवि कन्हैयालाल नंदन के बारे में अवेधश श्रीवास्तव ने बताया कि नंदनजी ने नए कवियों का एक ग्रुप तैयार किया था. वे कवि सम्मेलनों में जाया करते थे और उस ग्रुप के कई कवियों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान स्थापित की है. उन्होंने अपनी व्यस्तताओं के बीच अपार लेखन किया और लगभग हर विधा में लिखा.

अवेधश श्रीवास्तव बताते हैं कि वे हर किसी से बड़ी आत्मियता से मिलते थे. लगता ही नहीं था कि कोई उनसे पहली बार मिल रहा है.”

श्रीराम शर्मा

 

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