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अमृतलाल नागर

जन्म 17 अगस्त 1916 ई. को गोकुलपुरा, आगरा (उत्तर प्रदेश) में एक गुजराती ब्राह्मण परिवार में हुआ। आपके पिता का नाम राजाराम नागर था। आपके पितामह पं. शिवराम नागर 1895 से लखनऊ आकर बस गए थे। आपकी पढ़ाई हाईस्कूल तक ही हुई। फिर स्वाध्याय द्वारा साहित्य, इतिहास, पुराण, पुरातत्व व समाजशास्त्र का अध्ययन। बाद में हिन्दी, गुजराती, मराठी, बंगला, अंग्रेजी पर अधिकार। पहले नौकरी, फिर स्वतंत्र लेखन, फिल्म लेखन का खासा काम किया। ‘चकल्लस’ का संपादन भी किया। आकाशवाणी, लखनऊ में ड्रामा प्रोड्यूसर भी रहे।

अमृतलाल नागर (17 अगस्त, 1916 - 23 फरवरी, 1990) हिन्दी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार थे। आपको भारत सरकार द्वारा १९८१ में साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।
अमृतलाल नागर (17 अगस्त, 1916 – 23 फरवरी, 1990) हिन्दी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार थे। आपको भारत सरकार द्वारा १९८१ में साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।

1932 में निरंतर लेखन किया। शुरूआत में मेघराज इंद्र के नाम से कविताएं लिखीं। ‘तस्लीम लखनवी’ नाम से व्यंग्यपूर्ण स्केच व निबंध लिखे तो कहानियों के लिए अमृतलाल नागर मूल नाम रखा। आपकी भाषा सहज, सरल दृश्य के अनुकूल है। मुहावरों, लोकोक्तियों, विदेशी तथा देशज शब्दों का प्रयोग आवश्यकतानुसार किया गया है। भावात्मक, वर्णनात्मक, शब्द चित्रात्मक शैली का प्रयोग इनकी रचनाओं में हुआ है।

 

उपन्यास : महाकाल (1947) (1970 से ‘भूख’ शीर्षक प्रकाशित), बूँद और समुद्र (1956), शतरंज के मोहरे (1959), सुहाग के नुपूर (1960)(यह तमिल महाकाव्य ‘सिलप्पदिकारम:दुःख की लड़ी’ के आधार पर लिखा माना जाता है।), अमृत और विष (1966), सात घूँघट वाला मुखड़ा (1968), एकदा नैमिषारण्ये (1972), मानस का हंस (1973), नाच्यौ बहुत गोपाल (1978), खंजन नयन (1981), बिखरे तिनके (1982), अग्निगर्भा (1983), करवट (1985), पीढ़ियाँ (1990)।

कहानी संग्रह : वाटिका (1935), अवशेष (1937), तुलाराम शास्त्री (1941), आदमी, नही! नही! (1947), पाँचवा दस्ता (1948), एक दिल हजार दास्ताँ (1955), एटम बम (1956), पीपल की परी (1963), कालदंड की चोरी (1963), मेरी प्रिय कहानियाँ (1970), पाँचवा दस्ता और सात कहानियाँ (1970), भारत पुत्र नौरंगीलाल (1972), सिकंदर हार गया (1982), एक दिल हजार अफसाने (1986 – लगभग सभी कहानियों का संकलन)।

नाटक : युगावतार (1956), बात की बात (1974), चंदन वन (1974), चक्कसरदार सीढ़ियाँ और अँधेरा (1977), उतार चढ़ाव (1977), नुक्कड़ पर (1981), चढ़त न दूजो रंग (1982)।

व्यंग्य : नवाबी मसनद (1939), सेठ बाँकेमल (1944), कृपया दाएँ चलिए (1973), हम फिदाये लखनऊ (1973), मेरी श्रेष्ठ व्यंग्य रचनाएँ (1985), चकल्लस (1986) : उपलब्ध स्फुट हास्यँ-व्यंग्य रचनाओं का संकलन।

अन्य कृतियाँ : गदर के फूल (1957 – 1857 की इतिहास-प्रसिद्ध क्रांति के संबंध में महत्त्वपूर्ण सर्वेक्षण), ये कोठेवालियाँ (1960 – वेश्याओं की समस्या पर एक मौलिक एवं अनूठा सामाजिक सर्वेक्षण), जिनके साथ जिया (1973 – साहित्यकारों के संस्मरण), चैतन्य महाप्रभु (1978 – आत्म परक लेखों का संकलन), टुकड़े-टुकड़े दास्तान (1986 – आत्मोपरक लेखों का संकलन), साहित्यत और संस्कृति (1986 – साहित्यिक एवं ललित निबंधों का संकलन), अमृत मंथन (1991 – अमृतलाल नागर के साक्षात्कार (संपादक : डॉ॰ शरद नागर एवं डॉ॰ आनंद प्रकाश त्रिपाठी), अमृतलाल नागर रचनावली (संपादक : डॉ॰ शरद नागर, 12 खंडों में, 1992), फिल्मरक्षेत्रे रंगक्षेत्रे (2003 – नागरजी के फिल्मी, रंगमंच तथा रेडियो नाटक संबंधी लेखों का संकलन), अत्र कुशलं तत्रास्तु (2004 – नागरजी एवं रामविलास शर्मा के व्यक्तिगत पत्राचार का संग्रह)।

बाल साहित्य: नटखट चाची (1941), निंदिया आजा (1950), बजरंगी नौरंगी (1969), बजरंगी पहलवान (1969), बाल महाभारत (1971), इतिहास झरोखे (1970), बजरंग स्मडगलरों के फंदे में (1972), हमारे युग निर्माता (1982), छ: युग निर्माता (1982), अक्ल बड़ी या भैंस (1982), आओ बच्चोंं नाटक लिखें (1988), सतखंडी हवेली का मालिक (1990), फूलों की घाटी (1997), बाल दिवस की रेल (1997), सात भाई चंपा (1998), इकलौता लाल (2001), साझा (2001), सोमू का जन्म-दिन (2001), शांति निकेतन के संत का बचपन (2001), त्रिलोक विजय (2001)।

अनुवाद : बिसाती (1935 – मोपासाँ की कहानियाँ), प्रेम की प्याकस (1937 – गुस्तामव फ्लाबेर के उपन्यास ‘मादाम बोवरी’ का संक्षिप्त भावानुवाद), काला पुरोहित (1939 – एंटन चेखव की कहानियाँ), आँखों देखा गदर (1948 – विष्णु भट्ट गोडसे की मराठी पुस्ताक ‘माझा प्रवास’ का अनुवाद), 5. दो फक्‍कड़ (1955 – कन्हैकयालाल माणिकलाल मुन्शी के तीन गुजराती नाटक), सारस्वत (1956 – मामा वरेरकर के मराठी नाटक का अनुवाद)।

संपादन : सुनीति (1934), सिनेमा समाचार (1935-36), अल्ला कह दे (20 दिसंबर, 1937 से 3 जनवरी 1938, साप्ता्हिक), चकल्लस (फरवरी, 1938 से 3 अक्टूबर, 1938, साप्ताहिक), नया साहित्य (1945), सनीचर (1949), प्रसाद (1953-54) मासिक पत्रों का संपादन किया।।

संस्मरण : ‘गदर के फूल’, ‘ये कोठेवालियां’, ‘जिनके साथ जिया।’

अन्य : मोपासां, चेखव, लाबेयर, के. एम. मुंशी, मामा वरेरकर की रचनाओं के अनुवाद व विपुल बाल-साहित्य। नाटक, रेडियो नाटक व फीचर भी अनेक। 1940 से 1947 तक फिल्म सेनेरियो का लेखन कार्य किया। 1953 से 1956 तक आकाशवाणी लखनऊ में ड्रामा प्रोड्यूसर रहे।

अमृत लाल नागर को पुरस्कार

  • बूँद और समुद्र’ पर काशी नागरी प्रचारिणी सभा का विक्रम संवत 2015 से 2018 तक का बटुक प्रसाद पुरस्का्र एवं सुधाकर पदक
  • सुहाग के नूपुर’ पर उत्तर प्रदेश शासन का वर्ष 1962-63 का प्रेमचंद पुरस्कार,
  • अमृत और विष’ पर वर्ष 1970 का सेवियत लैंड नेहरू पुरस्कार,
  • अमृत और विष’ पर वर्ष 1967 का साहित्य अकादेमी पुरस्काकर,
  • ‘मानस का हंस’ पर मध्य प्रदेश शासन साहित्य परिषद का वर्ष 1972 का अखिल भारतीय वीरसिंह देव पुरस्कार,
  • ‘मानस का हंस’ पर उत्तर प्रदेश शासन का वर्ष 1973-74 का राज्य साहित्यिक पुरस्कार,
  • हिंदी रंगमंच की विशिष्ट सेवा हेतु सन 1970-71 का उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी पुरस्काार,
  • ‘खंजन नयन’ पर भारतीय भाषा, कलकत्ता (कोलकाता) का वर्ष 1984 का नथमल भुवालका पुरस्कार,
  • वर्ष 1985 का उ.प्र. हिंदी संस्थान का सर्वोच्च भारत भारती सम्मान (22 दिसंबर, 1989 को प्रदत्त),
  • हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग द्वारा ‘साहित्य वाचस्पति’ उपाधि से विभूषित।

 

किस्सागोई के माहिर रचनाकार थे अमृतलाल नागर : हिंदुस्तान समाचार

 

प्रेमचंदोत्तर हिंदी साहित्य को जिन साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं से संवारा है, उनमें अमृतलाल नागर का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। किस्सागोई के धनी अमृतलाल नागर ने कई विधाओं से साहित्य को समृद्ध किया।

अमृतलाल नागर ने कहानी और उपन्यास के अलावा नाटक, रेडियो नाटक, रिपोर्ताज, निबंध, संस्मरण, अनुवाद, बाल साहित्य आदि के क्षेत्र में भी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। साहित्य जगत में उपन्यासकार के रूप में सर्वाधिक ख्याति प्राप्त इस साहित्यकार का हास्य-व्यंग्य भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है।

अमृतलाल नागर का जन्म एक गुजराती परिवार में 17 अगस्त, 1916 ई. को गोकुलपुरा, आगरा, उत्तर प्रदेश में हुआ था। आगरा में इनकी ननिहाल थी। इनके पितामह पंडित शिवराम नागर 1895 में लखनऊ आकर बस गए थे। पिता पंडित राजाराम नागर की मृत्यु के समय नागर जी सिर्फ 19 वर्ष के थे।

 

पिता के असामयिक निधन के कारण जीवकोपार्जन का दबाव आन पड़ा और इस कारण अमृतलाल नागर की विधिवत शिक्षा हाईस्कूल तक ही हो पाई। विद्या के धुनी नागरजी ने निरंतर स्वाध्याय जारी रखा और साहित्य, इतिहास, पुराण, पुरातत्त्व, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान आदि विषयों पर और हिंदी, गुजराती, मराठी, बांग्ला एवं अंग्रेजी आदि भाषाओं पर अधिकार हासिल कर लिया।

रोजीरोटी के लिए अमृतलाल नागर ने एक छोटी सी नौकरी की और कुछ समय तक मुक्त लेखन एवं 1940 से 1947 ई. तक कोल्हापुर में हास्यरस के प्रसिद्ध पत्र ‘चकल्लस’ का संपादन किया। इसके बाद वे बंबई एवं मद्रास के फिल्म क्षेत्र में लेखन करने लगे। दिसंबर, 1953 से मई, 1956 तक वे आकाशवाणी, लखनऊ में ड्रामा, प्रोड्यूसर, रहे और उसके कुछ समय बाद स्वतंत्र रूप लेखन करने लगे।

किस्सागोई में माहिर नागरजी के साहित्य का लक्ष्य साधारण नागरिक रहा। अपनी शुरुआती कहानियों में उन्होंने कहीं-कहीं स्वछंदतावादी भावुकता की झलक दी है।

 

‘बूंद और समुद्र’ तथा ‘अमृत और विष’ जैसे वर्तमान जीवन पर लिखित उपन्यासों में ही नहीं, ‘एकदा नैमिषारण्ये’ तथा ‘मानस का हंस’ जैसे पौराणिक-ऐतिहासिक पीठिका पर रचित सांस्कृतिक उपन्यासों में भी उन्होंने उत्पीड़कों का पर्दाफाश करने और उत्पीड़ितों का साथ देने का अपना व्रत बखूबी निभाया है।

नागर जी की जिंदादिली और विनोदी वृत्ति उनकी कृतियों को कभी विषादपूर्ण नहीं बनने देती। ‘नवाबी मसनद’ और ‘सेठ बांकेमल’ में हास्य व्यंग्य की जो धारा प्रवाहित हुई है, वह अनंत धारा के रूप में उनके गंभीर उपन्यासों में भी विद्यमान है और विभिन्न चरित्रों एवं स्थितियों में बीच-बीच में प्रकट होकर पाठक को उल्लासित करती रहती है।

नागर जी के चरित्र समाज के विभिन्न वर्गो से गृहीत हैं। उनमें अच्छे बुरे सभी प्रकार के लोग हैं, किन्तु उनके चरित्र-चित्रण में मनोविश्लेषणात्मकता को कम और घटनाओं के मध्य उनके व्यवहार को अधिक महत्त्व दिया गया है।

 

अमृत लाल नागर रचित मानस का हंस : हिन्दी साहित्य की बेजोड़ निधि : डॉ. योगेन्द्र नाथ शर्मा ‘अरुण’

हिन्दी-कथा साहित्य में भले ही प्रेमचंद कथा-सम्राट माने जाते हैं, लेकिन उनके ‘गोदान’ की टक्कर का कोई ‘कालजयी’ उपन्यास अगर कभी ढूंढ़ा जाएगा तो समीक्षक निश्चय ही ‘मानस का हंस’ को स्वीकार करेंगे। जिन महाकवि तुलसी दास ने विश्व साहित्य को कालजयी रचना के रूप में रामचरितमानस जैसा महाकाव्य दिया है, उन्हीं को कथाकार अमृत लाल नागर ने अपने इस कालजयी उपन्यास मानस का हंस में अमृत बना दिया है। राष्ट्रीय साहित्य अकादमी,नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित ‘अमृत लाल नागर रचना संचयन’ की भूमिका में शरद नागर ने लिखा है—1973 से 1990 की अवधि में नागर जी के उपन्यास ‘मानस का हंस’, (1973), ‘नाच्यौ बहुत गोपाल’ (1978), ‘खजन नयन’ (1981), ‘बिखरे तिनके’ (1983), ‘अग्निगर्भा’ (1983), ‘करवट’ (1985) एवं ‘पीढ़ियां’ (1990) प्रकाशित हुए तथा इनके अतिरिक्त ‘चैतन्य महाप्रभु’ (जीवनी, 1978) उल्लेखनीय हैं। मानस का हंस उपन्यास हिंदी साहित्य में संभवतः ऐसा पहला उपन्यास है,जो किसी महाकवि के जीवन को आधार बनाकर रचा गया हो।

 

कथाकार अमृत लाल नागर ने वस्तुतः मानस का हंस और खंजन नयन शीर्षक से लिखे अपने दो उपन्यासों से हिंदी-जगत को दो ‘कालजयी’ महाकवियों के जीवन से परिचित कराया है, जो क्रमशः महाकवि तुलसी दास और महाकवि सूरदास हैं। सभी समीक्षकों ने एक स्वर से अमृत लाल नागर के इन दोनों उपन्यासों को ‘हिन्दी साहित्य’ की बेजोड़ निधि कहा है। स्वयं अमृत लाल नागर ने मानस का हंस के ‘आमुख’ में लिखा है-यह सच है कि गोसाईं जी की सही जीवन-कथा नहीं मिलती। यों कहने को तो रघुवर दास, वेणीमाधव दास, कृष्ण दत्त मिश्र, अविनाश रे और संत तुलसी साहब के लिखे गोसाईं जी के पांच जीवन चरित हैं। किन्तु विद्वानों के मतानुसार वे प्रामाणिक नहीं माने जा सकते। रघुवर दास अपने आपको गोस्वामी जी का शिष्य बतलाते हैं, लेकिन उनके द्वारा प्रणीत ‘तुलसी चरित’ की बातें स्वयं गोस्वामी जी की आत्मकथापरक कविताओं से मेल नहीं खाती।

 

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ऐसे अनमोल क्षण संजोए हुए हैं कि उसके अनुसार ही तुलसी के मनोव्यक्तित्व का ढांचा खड़ा करना मुझे श्रेयस्कर लगा। ‘रामचरितमानस’ की पृष्ठभूमि में मनस्कार की मनोछवि निहारने में भी मुझे ‘पत्रिका’ के तुलसी से ही सहायता मिली। ‘कवितावली’ और ‘हनुमान बाहुक’ में ख़ासतौर से और ‘दोहावली’ तथा ‘गीतावली’ में कहीं-कहीं तुलसी की जीवन-झांकी मिलती है। कथाकार को उपन्यास लिखने के लिए जो प्रयास करने पड़े, उनका विवरण पढ़कर विद्वान और सुधी पाठकगण सहज ही यह अनुमान लगा सकते हैं कि चार सौ वर्षों से भी अधिक की अवधि से जिस महाकवि तुलसी ने भारत के जनमानस को ‘राम कथा’ का अमृतपान कराया है, उसके जीवन को आधार बनाकर अमृत लाल नागर ने कितना परिश्रम करके इस कालजयी रचना का प्रणयन किया है। उन्होंने अपने आमुख में लिखा है- यह उपन्यास 4 जून, सन‍् 1971 ई. को तुलसी स्मारक भवन, अयोध्या में लिखना आरम्भ करके 23 मार्च, ’72, रामनवमी के दिन लखनऊ में पूरा किया।

 

उपन्यास को पढने वाले प्रायः सभी विज्ञ पाठकों ने इस कृति को नागर की ‘श्रेष्ठतम’ रचना माना है। नागर जी के बारे में हिंदी के व्यंग्य-सम्राट श्री लाल शुक्ल के अनुसार-साहित्य के विषय में उनकी विस्तीर्ण और व्यापक दृष्टि तथा रचना-कर्म को समाज के विविध पक्षों से जोड़ते हुए अपनी प्रतिभा का सार्थकतम उपयोग उनके कृतित्व को एक विशिष्टता प्रदान करता है। लगभग आधी शताब्दी तक वे अपने सक्रिय रचनात्मक अवदान से साहित्य में एक महत्वपूर्ण उपस्थिति बने रहे। हिंदी के ही नहीं,समस्त भारतीय साहित्य के वे एक लोक स्वीकृत और विशिष्ट कृतिकार हैं। उपन्यास को विद्वान पाठक जब भी पढ़ेंगे, तभी उन्हें दो कालजयी व्यक्तित्वों से ‘भावमिलन’ का सौभाग्य प्राप्त होगा, वे हैं महाकवि तुलसी दास और कथाकार अमृत लाल नागर।

 

अमृतलाल नागरः ग्रामीण इतिहास का राष्ट्रवादी संदर्भ-  देवेंद्र चौबे

(देवेन्द्र चौबे [cdevendra@gmail.com, dkchoubey@mail.jnu.ac.in] भारतीय भाषा केन्द्र, जेएनयू, नई दिल्ली में प्रोफेसर एवं एल्युमनी एसोसिएशन ऑफ जेएनयू के अध्यक्ष हैं।)

 

हिंदी के जिन लेखकों के लेखन में भारतीय इतिहास लेखन के कुछ सूत्र मिलते हैं उनमें अमृतलाल नागर (17.8.1916-22.2.1990) का स्थान महत्त्वपूर्ण है। उनकी छवि एक ऐसे कथाकार के रूप में उभरकर सामने आती है जिसने भारतीय समाज के इतिहास और शहरों की संस्कृति को जातीय (राष्ट्रीय) जीवन से जोड़कर लोक समाज के इतिहास को गहराई के साथ समझने और स्थापित करने की जिद ठान रखी हो। यह भी माना जाता है कि हिंदी आलोचना में नवजागरण के बहाने जो काम रामविलास शर्मा करते रहेरचना के क्षेत्र में वहीं काम 1857 ई. में हुए संघर्ष कोभारत का पहला स्वाधीनता संग्राम मानने के सवाल को लेकर एक ठोस असहमति के साथ अमृतलाल नागर करते रहे। रामविलास शर्मा मानते थे कि 1857 ई. में भारतीयों ने अपनी पहली स्वाधीनता की लड़ाई लड़ी थी जबकि अमृतलाल नागर का मानना था कि यह संघर्ष नवाबों-जमींदारों ने अपनी सत्ता बचाने के लिए किया था। वास्तविक संघर्ष तो 1885 ई. में कांग्रेस के गठन और उसके बाद 1905 में बंगाल विभाजन के साथ शुरू हुआ जिसे बाद में गाँधी ने नेतृत्त्व प्रदान किया। एकदा नैमिषारण्ये से लेकर उनके अंतिम उपन्यास पीढ़ियाँ में प्राचीन भारत से लेकर आधुनिक भारत के समाजउसकी संरचना और सामाजिक विकास की ऐतिहासिक प्रक्रियाओं को समझा जा सकता हैं। लेकिन खास बात यह है कि अपनी गदर के फूल जैसी कृति में अमृतलाल नागर भारतीय इतिहासखासकर भारतीय राष्ट्रवाद के उन स्रोतों को खंगालने का प्रयास करते हैं जिनसे ग्रामीण इतिहास को समझने में मदद मिलती है। इतना ही नहींयहाँ औपनिवेशिक-साम्राज्यवादी भारत में ग्रामीण प्रतिरोध और संघर्ष का इतिहास एक नए रूप में दिखलाई पड़ता है। इस लेख में अमृतलाल नागर के बहाने भारतीय इतिहास की इन्हीं संरचनाओं को समझने का प्रयास किया गया हैं। -ले.,

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हिंदी के जिन लेखकों के लेखन में भारतीय इतिहास लेखन के कुछ सूत्र मिलते हैं उनमें अमृतलाल नागर (1916-1990) का स्थान महत्त्वपूर्ण है। आधुनिक भारत में 19 वीं-20 वीं सदी, खासकर साम्राज्यवाद विरोधी नवजागरण-काल (1857-1947) में 1857 के संग्राम एवं 1878 के प्रेस एक्ट के कारण देश की मुक्ति के लिए अपनाये गये धर्म संबंधी मिथकीय उपयोगों के कारण इतिहास एवं राष्ट्र संबंधी बहसें काफी तेज हुई तथा हिंदी के चिंतकों-लेखकों में भारतेंदु हरिश्चंद्र, बालकृष्ण भट्ट, प्रतापनारायण मिश्र, बालमुकुंद गुप्त आदि से लेकर महावीर प्रसाद द्विवेदी, रामचंद्र शुक्ल, प्रेमचंद, निराला, जयशंकर प्रसाद, माखनलाल चतुर्वेदी, शिवपूजन सहाय, बालकृष्ण शर्मा नवीन, सुभद्रा कुमारी चैहान, यशपाल, दिनकर जैसे लेखकों ने राष्ट्र की मुक्ति एवं निर्माण संबंधी प्रक्रियाओं को काफी गतिशील बनाया जिनसे भारतीय राष्ट्र एवं राष्ट्रवाद की विभिन्न धाराओं को समझने में मदद मिलती हैं। इनमें से अधिकांश लेखक ग्रामीण पृष्ठभूमि से आये थे तथा उनकी रचनात्मकता का एक बड़ा हिस्सा ग्रामीण संदर्भों के आधुनिकीकरण की प्रक्रियाओं से था तथा वे सचेत होकर ग्रमीण समाज को आधुनिक संदर्भों से जोड़ रहे थे; फिर भी, राष्ट्रवादी इतिहासकारों की धारा भी ग्रामीण समाज की नयी चेतना को ठीक से नहीं समझ पायी और इसीलिए, इस प्रकार के लेखकों के साहित्य अथवा पाठ में आया इतिहास, कभी भी इतिहास लेखन की मुख्यधारा का हिस्सा नहीं बन पाया। जबकि गाँधी इस तथ्य को समझ रहे थे तथा इसीलिए उनका ध्यान बार-बार गाँवों की तरफ जाता था। सन् 1917 में उनका नील की खेती करनेवाले बिहार के ग्रामीण किसानों के हित में चंपारण जाना भी उनकी इसी चेतना का अहम हिस्सा माना जा सकता है यद्यपि इतिहासकार इसे उनकी व्यवसायिक जिंदगी का एक पक्ष मानकर उसका आकलन करते रहे हैं । उनकी हिंद स्वराज एवं मेरे सपनों का भारत जैसी कृतियों के मूल में उनकी गाँव संबंधी सोच के इन संदर्भों को खोजा जा सकता हैं। यद्यपि इनके पूर्व के समाज-सुधारकों में राजा राममोहन राय, दयानंद सरस्वती, जोतिबा फूले, बालगंगाधर तिलक आदि की ख्याति भी उस दौर में उनके राष्ट्र, स्त्री एवं अन्य सामाजिक सुधार संबंधी कार्यों एवं ईश्वर के प्रति आम आदमी की बनी हुई आस्था को झकझोरने के कारण फैली तथा जिसका प्रत्यक्ष असर गाँधी, अंबेडकर और भगत सिंह के चिंतन एवं आंदोलनों में भी दिखलाई पड़ता हैं तथा जिसकी उपस्थिति गाहे-बगाहे उनकी ग्रामीण समाज से संबंधित सामाजिक गतिशीलता तथा आंदोलनों में ताकतवर तरीके से दिखाई देती रही हैं। लेकिन परिणाम सिर्फ एक निकलता है और वह सिर्फ यह कि उसकी समस्त धाराएँ किसान संदर्भों तक आकर रूक जाती हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि देशीय भाषाओं में लिखनेवाले इतिहासकार भी आगे बढ़कर ग्रामीण इतिहास को समझने या निर्माण करने की चिंता या प्रयास नहीं करते हैं जबकि इसके लिए जन साहित्य से लेकर लोक स्मृतियों तक में अनेक संदर्भ सार्वजनिक जीवन में उपलब्ध थे। उनकी पुष्टि ऑफिशियल डॉक्यूमेंट्स भी करते हैं। इसका बेहतर उपयोग इतिहासकार शाहिद अमीन के लेख ‘स्मृति और इतिहासः चौरी चौरा, 1922-1992‘ में देखा जा सकता है। हिंदी के बाद के लेखकों ने भी इन सवालों को साहित्य के ‘जातीय‘ रूप के संदर्भ में विचार के केंद्र में रखा तथा हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामविलास शर्मा, मुक्तिबोध एवं बाद के चिंतकों में नामवर सिंह, मैनेजर पाण्डेय जैसे लेखकों ने साहित्य के जातीय संदर्भों के बहाने औपनिवेशिक भारत में कृषकों-मजदूरों के प्रतिरोध को बहस के केंद्र में रखते हुए राष्ट्र-मुक्ति के सवालों को समझने का प्रयास किया।

 

इनमें एक लेखक के रूप में अमृतलाल नागर इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि उन्होंने भारतीय इतिहास और उसे प्रभावित करनेवाले चिंतन एवं दर्शन के सवालों को लेकर ठोस रचनात्मक पहल की तथा कुछ ऐसी कृतियों की रचना की जिनसे भारतीय राष्ट्र के निर्माण में ग्रामीण संदर्भों की गतिशील भूमिका दिखलाई पड़ती हैं। दूसरे अर्थों में, उनमें भारत के ग्रामीण इतिहास; खासकर 1857 के ग्रामीण प्रतिरोध के इतिहास लेखन के कुछ सूत्र ढूढे़ं जा सकते हैं।

 

सवाल यह है कि भारतीय इतिहास के वे कौन-से सवाल हैं जिन्हें लेकर अमृतलाल नागर एक लेखक के रूप में इतिहास जैसे समाज विज्ञान के क्षेत्र में प्रवेश करते है तथा उनपर सिर्फ राय ही नहीं रखते है; बल्कि  एकदा नैमिषारण्ये (1972), शतरंज के मोहरें (1957), करवट (1985), पीढ़ियां (1990) आदि उपन्यासों, गदर के फूल (1957) जैसे गदर संबंधी स्मृतियाँ और किंवदंतियों के संकलनों तथा मराठी के विष्णुभट्ट गोडशे वरसईकर कृत माझा प्रवास (1907) का आंखों देखा गदर के नाम से हिंदी में अनुवाद कर इतिहास संबंधी अपनी पकड़ और समझ का विस्तार भी करते हैं। उदाहरण के लिए, जाति (राष्ट्र) क्या है ? इसका निर्माण कैसे होता है? इतिहासकार अथवा लेखक इसके निर्माण की प्रक्रिया को किस प्रकार अपने चिंतन का हिस्सा बनाते हैं आदि पर विचार करना, सिर्फ पाठों की रचना करना ही नहीं हैं अपितु उन प्रक्रियाओं को भी सामने लाना है जिनसे इतिहास की निर्मितियाँ होती हैं। इस प्रक्रिया में उन सूत्रों की भी तलाश करनी पड़ती हैं जो इतिहास को बनाने में मदद करते है। हिंदी के एक बड़े चिंतक, हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है कि कि ‘समूची जाति (राष्ट्र) भी एक व्यक्ति, मनुष्य की भांति है।’ (संदर्भः साहित्य सहचर) यानी कि व्यक्ति अथवा मनुष्य आपस में मिलकर जाति अथवा जातियों का निर्माण करते हैं। जैसे सामाजिक निर्माण की प्रक्रिया को लेकर अमृतलाल नागर मानते है कि बूंद-बूंद (व्यक्ति-व्यक्ति) से लहरें और लहरों से समुद्र (समाज) बनता है। (संदर्भः बूँद और समुद्र) इसी तरह की रचनाएं ‘जातीय (राष्ट्रीय) साहित्य’ कहलाती हैं जिसका उल्लेख करते हुए आचार्य द्विवेदी, प्रेमचंद को हिंदी के जातीय साहित्य के सबसे बड़े लेखक के रूप में स्थापित करते हैं तथा बताते है कि कृषि-संस्कृति के कारण कैसे उनका साहित्य उत्तर भारत को समझने में मदद करता है। साहित्य में अभिव्यक्त यह ‘जातीय चेतना’ आचार्य द्विवेदी को बांग्ला के रवींद्रनाथ टैगोर, संस्कृत के कालिदास, हिंदी के तुलसीदास, बिहारी और अंगे्रजी के शेक्सपियर में विशेष रूप से दिखाई पड़ती हैं। फारसी के अमीर खुसरो भी इसके बहुत बड़े उदाहरण है जिनका लेखन भारत (हिंद अर्थात हिंदुस्तान) को समझने में मदद करता है। पर, महत्वपूर्ण बात यह है कि इस जातीय चेतना के केंद्र में मानव समाज, खासकर वह समाज है जिसकी अभिव्यक्ति की जरूरत लेखक सबसे अधिक महसूस करता है जैसा कि प्रेमचंद प्रेमाश्रम और गोदान में इसे ‘पददलित और अपमानित कृषक’ के रूप में करते हैं। जबकि समाज के निर्माण में इन समूहों की एक अहम भूमिका होती हैं तथा भारतीय इतिहास और राष्ट्र को समझने के लिए ये समूह महत्वपूर्ण सूत्र देते हैं। अमृतलाल नागर के साहित्य में यह समाज ‘मध्यवर्ग’ एवं 1857 के उस ग्रामीण समूह के रूप में दर्ज हैं, जिसके क्रमिक सामाजिक इतिहास को वे क्रमशः ‘करवट’ (1857 के विद्रोह एवं साम्यवादी गुलामी के बाद 1885 में गठित कांग्रेस के साथ उभरता हुआ मध्यवर्ग), ‘पीढ़ियां’ (अंग्रेजी दासता के खिलाफ राष्ट्र-मुक्ति के लिए संघर्षरत निम्म-मध्यवर्ग), ‘बूंद और समुद्र’ (1947 में स्वाधीनता प्राप्ति के बाद राष्ट्रीयता के निर्माण एवं विकास में लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं से जुड़ता तथा विकास की नयी मंजिलें ढूंढता मध्यवर्ग), ‘अमृत और विष’ (राजनीतिक अराजकता एवं समाजवाद के सपने में समकालीन इतिहास रचता युवा मध्यवर्ग), ‘नाच्यौ बहुत गोपाल’ (सामाजिक विषमता के साथ संवाद करता एवं अस्तित्व के लिए संघर्षरत दलित निम्न-मध्यवर्ग) आदि उपन्यासों में प्रस्तुत करते हैं। परंतु, उनके उपन्यासों में सिर्फ मध्यवर्ग-निमनवर्ग ही नहीं है, बल्कि यहाँ गदर के फूल (1957) जैसी कृतियों में गदर संबंधी स्मृतियाँ और किंवदंतियों के बहाने भारत का ग्रामीण समाज और ये कोठेवालियां (1960) के रूप में आधी शोषित दुनिया (स्त्री) की वह वास्तविक सच्चाई भी है, जिसे आम तौर से प्रगतिशील इतिहासकार भी अनावश्यक मानकर छोड़ देते हैं। यहाँ, हम भारतीय इतिहास के कुछ संदर्भों पर विचार करते हुए ग्रामीण इतिहास के इन्हीं राष्ट्रवादी संदर्भों को समझने का प्रयास करेंगे।

 

2.

अन्य ऐतिहासिक अध्ययनों की तरह भारत में भी इतिहास को क्रमशः प्राचीन, मध्य और आधुनिक  -तीन कालों में देखने का प्रचलन अब भी बना हुआ है। इधर कुछ इतिहासकारों ने समकालीन इतिहास पर विचार करना एवं उसका लेखन करना प्रारंभ किया हैं। परंतु चिंतन की दुनिया एवं अधिकांश विश्वविद्यालयों में अब भी समकालीन इतिहास पर विचार करने का प्रचलन नहीं हैं। वैसे तो अमृतलाल नागर पाठ के स्तर पर प्राचीन और मध्यकालीन इतिहास लेखन के कोई ठोस सूत्र नहीं देकर उसके सामाजिक इतिहास वाले पक्ष को सामने लाने का प्रयास करते है, परंतु आधुनिक इतिहास लेखन; खासकर, 1857 की समझ को लेकर वे इतिहासकारों के साथ बिना नाम लिये साफ-साफ बहस एवं सीधी मुठभेड़ करते हैं। इससे उनकी इतिहास संबंधी धारणाओं को समझने में मदद मिलती है। खासकर, उनके तीन उपन्यासों में उनकी भारतीय इतिहास के तीनों काल के कुछ धारणात्मक सूत्र दिखलाई देते है जिसे उनके निम्नलिखित वक्तव्यों में देखा और समझा जा सकता हैं:

एक.

नैमिष आंदोलन को ही मैंने वर्तमान भारतीय या हिंदू संस्कृति का निर्माण करनेवाला माना है। वेद, पुर्नजन्म, कर्मकाणडवाद, उपासनसवाद, ज्ञानमार्ग आदि का अंतिम रूप से समन्वय नैमिषारण्य में ही हुआ। अवतारवाद रूपी जादू की लकड़ी घूमाकर परस्पर विरोधी संस्कृतियों को घुला-मिलाकर, अनेकता में एकता स्थापित करनेवाली संस्कृति का उदय नैमिषारण्य में हुआ, और यह काम मुख्यतः एक-राष्ट्रीय दृष्टि में ही किया गया था।

(एकदा नैमिषारण्य, भूमिका, पृष्ठः12)

दो.

इस उपन्यास की रचना वस्तुतः मैंने अपने एक प्रस्तावित गदर-कालीन उपन्यास की पूर्व-पीठिका के रूप में की थी।…उपन्यास बनकर इतिहास मानवीय समस्याओं को देखने, परखने के लिए ‘सूक्ष्मवीक्षण-यंत्र’ का सा काम देने लगता है।

(शतरंज के मोहरे, भूमिका, पृष्ठः 8-9)

तीन.

समय का परिवर्तन इतिहास की पॅूजी है। गदर के बाद अंग्रेजी शासन और शिक्षा के प्रभाव से हमारे समाज में एक नई मानसिकता का उदय हुआ था। संघर्षों की प्रक्रियाओं में पुरानी जातीय पंचायतों को नए जातीय ’असोसिएशनों’ ने करारे धक्के ही नहीं दिए वरन् कालान्तर में उन्हें ध्वस्त ही कर डाला । इन जातीय संघर्षों से ही नई राष्ट्रीयता ने जन्म पाया था।

(करवट, भूमिका, पृष्ठः7)

उपर्युक्त तीनों उद्धरण अमृतलाल नागर के ऐतिहासिक उपन्यासों से हैं। पहला उद्धरण में, जहाँ वे प्राचीन भारत की समझ एवं नैमिष आंदोलन के कारण अनेकता में एकता स्थापित करनेवाली हिंदू संस्कृति एवं भारतीय ज्ञान परंपरा की संवादधर्मी चेतना की भूमिका की तरफ संकेत करते है, वहाँ दूसरे में वे उत्तर मध्यकाल के लखनऊ के दो नवाबों की विलासितापूर्ण जिंदगी एवं बादशाह बेगम द्वारा हिंदू-इस्लाम की एकता के लिए किए गये ईद, छट्ठी तथा जन्माष्टमी जैसे सांस्कृतिक-धार्मिक अनुष्ठानों के कारण भारत में साँझी-संस्कृति की उभरती हुई परंपरा के निर्माण की चेतना को समझने का प्रयास करते है। तीसरा उद्धरण, जातीय संगठनों के अंत के बाद आधुनिक भारत के उदय को लेकर है जहाँ अमृतलाल नागर यह समझने का प्रयास करते है कि इसका कारण 1857 है या 1885 के बाद कांग्रेस का उदय या अंग्रेजी शिक्षा ? अमृतलाल नागर इसमें 1857 की कोई बड़ी भूमिका नहीं मानते है अपितु उसे वे मात्र राज्य-क्रांति मानते हुए बहुत ही जोर देकर वे एक साक्षात्कार में कहते है कि ‘‘ सन् 1857 के विप्लव को मैं राज्य-क्रांति तो मान सकता हॅू, किंतु उसे स्वतंत्रता का पहला आंदोलन न कभी माना है और न कभी मानूंगा।” क्यों ? इसका कारण बताते हुए वह कहते है कि ‘‘ सदियों की सामंती साम्राज्यवादी यंत्रणाओं में घुट-घुट कर जीते हुए इंसान ने एक नई करवट जरूर ली, लेकिन वह क्रांति शुरू में स्वतंत्रता की चेतना को लेकर नहीं उभरी। यदि ऐसा होता तो मुगल सम्राट से लेकर तमाम राजे-नवाब, सूबेदार पहले से ही सजग और संगठित होते। पहले तो वे सबके सब अपनी ही अहंता में गर्क यानी डूबे हुए थे। एक-दूसरे से लड़ते-झगड़ते रहते थे। एक-दूसरे को मरने के लिए अंग्रेज या फ्रांसीसियों का सहारा लेते। और जब अंग्रेज उनकी खोपड़ी पर सवार होकर अपनी सुनिश्चित योजना के अनुसार राज्य हड़पने लगे तब वे जागे। इस जगाने को मैं जागरण नहीं मानता और इसीलिए उसे भारतीय स्वतंत्र्य चेतना का प्रस्थान बिंदु मानना गलत है। स्वतंत्रता की चेतना तो गदर के बाद शुरू हुई।” (संदर्भः कथाकार अमृतलाल नागर पुस्तक में शामिल बातचीत ‘लेखन में सामयिक या शाश्वत का सवाल‘)

 

स्पष्टतः जितनी गहरी वैचारिकता के साथ अमृतलाल नागर 1857 को स्वतंत्रता का पहला आंदोलन मानने को लेकर अपना मत रखते है तथा आधुनिक भारत के उदय में 1857 के बाद की परिस्थितियों की भूमिका मानते है, बड़े-बड़े इतिहासकार भी इस तरह का दावा करने के पहले सोचते हैं। अमृतलाल नागर संभवतः यह दावा इसलिए कर पाते है कि उन्हें भारतीय समाज के विकास की एक गहरी समझ थी तथा औपनिवेशिक भारत में प्रभुत्व और मातहती के बहुआयामी द्वंद्व को बेहतर तरीके से समझते थे। इस समझ के तहत ही वह 1985 में प्रकाशित उपन्यास ‘करवट‘ में औपनिवेशिक भारत के 1857 के बाद के साम्राज्यवादी बनने की प्रक्रिया एवं अंग्रेजी शिक्षा के कारण एक नयी चेतना के प्रभाव के आकलन का प्रयास करते है। वे उसे तार्किक भी बनाते है लेकिन इसके समानांतर 1957 में प्रकाशित कृति गदर के फूल में वे इन प्रभावों से परे जाकर ग्रमीण समाज के अंदर मौजूद उस पारंपरिक और राष्ट्रवादी चेतना को को समझने का प्रयास करते है जिसे कई बार हम मात्र कृषक-मजदूर संघर्ष तक सीमित कर उसे भी मुख्यधारा यानी कि प्रभु-वर्ग के इतिहास का हिस्सा मान लेते है। बिपनचंद्र जैसे प्रगतिशील-राष्ट्रवादी इतिहासकार भी स्वाधीनता आंदोलन के दौरान किसानों की पहल को स्वतंत्र पहल न मानकर उसे गाँधी के नेतृत्त्व में किये गये आंदोलनों का हिस्सा मानकर उसका आकलन करते है। जबकि यह सच है उनमें से अधिकांश पहल ग्रामीण समाज कि स्वतंत्र पहल हुआ करती थी जिन्हें गाँधी बाद में नेतृत्व प्रदान करते हैं। चैरी-चैरा की घटना ग्रामीण लोगों (किसानों) द्वारा की गई इस प्रकार की एक बड़ी पहल है जिसके हिंसक रूप को लेकर गाँधी उसकी निंदा तथा प्रायश्चित के लिए उपवास करते है। खास बात है कि गदर के फूल में अमृतलाल नागर इस प्रकार की परिघटनाओं को स्थानीय इतिहास (Local History) का हिस्सा मानकर उनका दस्तावेजीकरण करते हैं तथा उनके अंदर निर्मित हो रहे राष्ट्र के लिए प्रेम और बलिदान को आधुनिक भारतीय राष्ट्र के निर्माण का अहम हिस्सा मानकर गर्व करते है। इसे कई बार ’निम्न’ यानी कि गाँव का मानकर इतिहासकारों द्वारा छोड़ दिया जाता है, जबकि कई बार ऐसी ही स्थानीय परिघटनाओं से बड़े-बड़े इतिहासों का निर्माण भी होता हैं।

 

दरअसल, इतिहास भद्र और आमजन दोनों का होता हैं। एक के बिना लिखा गया कोई भी इतिहास अधूरा ही होता है और वह कभी भी न तो समाज का और न ही राष्ट्र की ऐतिहासिक निर्मिति का बखान कर सकता है। जिस प्रकार भद्रजन के इतिहास लेखन में नगरीय सभ्यताएँ प्रभावशाली भूमिका निभाती है, ठीक उसी प्रकार आमजन के इतिहास लेखन में ग्रामीण परंपराएँ और कृषि-संघर्ष। आमजन के इस इतिहास को ‘ग्रामीण इतिहास‘(Village History) का विकल्प माना जा सकता है जहाँ ग्रामीण समाज अपने डोमेन में मिथकों और यथार्थ के सहारे अपने गाँव के इतिहास का ढाँचा खड़ा करता हैं जो ग्रामीण समाज के विश्लेषण और इतिहासकार रोमिला थापर के शब्दों में ’’समाज की अधिक प्रबल मान्यताओं का पता’’ लगाने में मदद करती हैं। कारण, मिथकों का गहरा संबंध अत्यंत प्रचीन काल से संबंधित स्थापित हो चुकी घटनाओं से होता हैं जो कई बार इतिहास की तरह सच लगती हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि वहाँ व्यक्ति का इतिहास गाँव का इतिहास होता है, समाज का इतिहास ग्रामीण परंपराओं का इतिहास होता है, किसान एवं खेती-बारी का इतिहास आर्थिक सरंचनाओं का इतिहास होता हैं, नदियों-तालाबों-मंदिरों-सार्वजनिक स्थलों का इतिहास संस्कृतियों का इतिहास होता हैं। यद्यपि इस प्रकार के विभाजन कई बार ‘पूरा इतिहास’ (Total History) के निर्माण में बाधक होते हैं, पर यह भी उतना ही सच है कि बिना इस प्रकार के प्रयास के न तो देश का पूरा इतिहास लिखा जा सकता है और न ही समाज का। शाहिद अमीन और ज्ञानेंद्र पाण्डेय ने निम्नवर्गीय प्रसंग-2 की भूमिका में लिखा है कि “कल और आज की राजनैतिक परिस्थितियों की तुलना करने पर एक और खासियत सामने आती है। अठारहवीं सदी से आज तक के इतिहास को प्रजातंत्र की लड़ाई -व्यक्तिगत स्वाधीनता की, सामूहिक हकों की, विश्वभर के हरेक जनसमूह की बराबरी की -मानना गलत न होगा। जाहिर है कि इस व्यक्तिगत/उदारवादी आंदोलन के साथ-साथ जातीय-क्षेत्रीय, राष्ट्रीय, भाषाई, सांस्कृतिक अस्मिता की लड़ाई भी जुड़ी रही है।’’ कहा जा सकता है कि शाहिद अमीन और ज्ञानेंद्र पाण्डेय इतिहास की उस धारा की बात कर रहे है जिसे प्रसिद्ध इतालवी इतिहासकार अंतोनियो ग्राम्शी के प्रभाव में ‘सबाल्टर्न’ को ध्यान में रखकर पूरी दुनिया में लिखा गया। यहाँ आर्थिक (शोषण) इतिहास के समानांतर अन्य सामाजिक संदर्भों (प्रजातीय, रंग, वर्ण, लिंग आदि) पर हो रहे शोषण के आधार पर इतिहास रचने की कोशिश होती है। अर्थात इतिहास उनका भी लिखा जाए जो समाज में सबसे गौण, दलित और उत्पीड़ित जन है। इसीलिए इस प्रकार के इतिहास लेखन में ग्रामीण संदर्भो की निर्णायक भूमिका होती है। एक तरह से गाँव इस प्रकार के इतिहास लेखन की कार्यशाला होते हैं जहाँ पर प्रभुवर्ग अपने मातहतों के साथ गुलामों-सा व्यवहार करता हैं एवं मातहतों की तरफ से मिल रही चुनौती के बाद भी अपना वर्चस्व सतत् बनाये रखने का प्रयास। गदर के फूल में अमृतलाल नागर जाने-अनजाने इतिहास की इसी धारा को पकड़ने की कोशिश करते है जिनसे इतिहास की एक ग्रामीण धारा बननी शुरू हो जाती है।

 

सवाल है, अमृतलाल नागर के यहाँ इतिहास का वह कौन-सा पक्ष मौजूद है जिसमें ग्रामीण इतिहास के निर्माण की चेतना दिखलाई पड़ती है तथा जिसे गदर के फूल के बहाने समझा जा सकता है? यद्यपि इसे समझना और उसका निर्धारण करना एक कठिन कार्य है लेकिन उनकी यह पुस्तक कुछ ऐसे स्रोत उपलब्ध कराती है जिनसे भारत के ग्रामीण प्रतिरोध के इतिहास को समझा जा सकता है एवं उसके जरिये निर्मित उस राष्ट्रवाद का विश्लेषण किया जा सकता है जो मुख्यधारा के राष्ट्रवाद से भिन्न है। इसकी भूमिका में अमृतलाल नागर ने निम्नलिखित ब्यौरा दिया है: ‘‘सत्तावनी क्रांति संबंधी अपने उपन्यास के लिए ऐतिहासिक सामग्री एकत्र करते हुए मुझे लगा कि अपने उपन्यास के क्षेत्र, अवध में घूम-घूमकर गदर संबंधी स्मृतियाँ और किंवदंतियाँ आदि एकत्र किये बिना मेरी गढ़ी हुई कहानी में झकोले रह जाएंगे।..भारतीय दृष्टिकोण से लिखें गये इतिहास के अभाव में जनश्रुतियों के सहारे ही इतिहास की गैल पहचानी जा सकती है।” इतिहास की ‘गैल’ यानी कि इतिहास की गली, रास्ता अथवा मार्ग। अब, यह उनका कथन एक तो यह तथ्य रखता है कि 1857 को नये सिरे से समझने के लिए सिर्फ ऑफिशियल डाक्यूमेंट्स पर्याप्त नहीं है, उसके लिए संबंधित क्षेत्र के गाँवों-कस्बों में जाना अनिवार्य है और दूसरा कि इसे समझने के लिए भारतीय दृष्टिकोण की जरूरत है।

 

लेकिन सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण हैं, नये इतिहास की खोज के लिए क्षेत्र का चयन! कारण, बिना क्षेत्र के चयन एवं निर्धारण के इतिहास का विकास संभव नहीं है। अमृतलाल नागर क्या करते है? कैसे क्षेत्र में जाने की बात करते है ताकि 1857 का नया इतिहास लिखा जा सकें। यहाँ वे अवध क्षेत्र यानी कि अवध के गाँवों और कस्बों में भटकने की बात करते हैं जहाँ लोक स्मृतियों में इतिहास के अनेक सूत्र बिखरे पड़े हैं। वे ऐसा करते भी है और अपनी यह ग्रामीण क्षेत्रों की यात्रा की शुरूआत बाराबंकी से करते हुए भयारा, जहांगीराबाद, कुर्सी, महादेवा, फैजाबाद, सुल्तानपुर, गोंडा, बहराईच, जेवांग्राम, टिकुरी, बौंडी, इकौना, रेहुआ, दौंढै, दुबिधापुर, सीतापुर, मितौली, खैराबाद, नैमिषरण्य, रायबरेली, डलमऊ, भीरा गोविंदपुर, शंकरपुर, परशुरापुर ठिकहाई, हरचंदपुर, कठवारा, सेमरी, गढ़ी बेहार, खजूर, हरदोई, उन्नाव आदि होते हुए लखनऊ में हुए 1857 के संघर्ष पर समाप्त करते है। इस क्रम में वे एक ऐसे तथ्य का उदघाटन करते है जो न तो भारतीय इतिहास में कहीं दर्ज है और न ही किसी सरकारी दस्तावेज में। बहराईच के गाँवों की यात्रा के दौरान उन्हें ग्रमीणों द्वारा लिखित एक पुस्तक मिलती है जिसका नाम हैः ‘जंगनामा‘। इस पुस्तक में उस इलाके में 1857 में मारे गये उन सेनानियों के नाम दर्ज है जिन्हें अंग्रेजों ने फाँसी पर चढ़ा दिया था। इसका रोचक उल्लेख करते हुए उन्होंने लिखा है जब उन्होंने लोगों से कहा कि एक-एक कर वे उनके नाम लिखायें जो 1857 में लड़े थे या मारे गये थे, तो उसका ब्यौरा देते हुए लोगों ने बताया किः

‘‘ई सब नांव ‘जंगनामा‘ में लिखें हैं।‘‘

कई तरफ से आवाजें उठीं, ‘‘हां, जंगनामा मां लिखें हैं।‘‘

‘जंगनामा‘ के प्रति मेरी उत्सुकता गहरी हो उठी, परंतु कुछ पूछने से पहले ही पाण्डे जी सुनाने लगे- ‘‘भाजि गए इलंगी झिलंगी।/भाजि गए गज के असवारा।।/हरदत्त कहैं हम खेत लड़ब।/उइजाय लुकान नदी के किनारा।।/एक जीवत है बलभद्र बली।/जिन जाय झपटि अंगरेज को मारा।।

पाण्डे जी के बाद तुरंत ही एक नवयुवक खड़ा होकर सुनाने लगा -‘‘बोंडी का राजा लौंडी भवा, रेहुआ भवा गुलाम।/बना रहै चहलारी क राजा-।।‘‘

(गदर के फूल, पृष्ठः 95)

 

स्पष्टतः मुख्यधारा के इतिहासकारों के लिए उपर्युक्त सारे विवरण अमहत्वपूर्ण हैं, परंतु जिनकी दिलचस्पी सामाजिक इतिहास; खासकर गाँव के इतिहास में है तथा जो भारतीय दृष्टि से देश का इतिहास लिखना या जानना चाहते हैं उनके लिए ये सारे स्रोत ग्रामीण इतिहास की इस धारा को समझने में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कारण, नागर जी यहाँ जो दूसरा महत्वपूर्ण कार्य करते है, वह यह कि यहाँ वे उन ग्रामीण शहीदों की सूची भी देते है जो 1857 के संघर्ष में मारे गये थे। उनमें से कुछ चुनिंदा नाम इस प्रकार हैः 1.दरियावसिंह, बलभद्रसिंह के मामा, 2. हीरासिंह, बलभद्रसिंह के काका, 8. मंगलसिंह मजरे राजपुर स्थान किसनापुर के निवासी, 13. बल्लू, 19. कालिका थानगांव के निवासी, 30. रघुनाथ, 48. बलदी पाण्डे मुरवा गाँव के निवासी, 62. रामदयाल कहार नरपति पुरवा के निवासी, 76. सीताराम नाऊ, 81. भिखारी गाड़ीवान, 86.शिवदीन सिंह बैस, 89. कुंजबिहारी का साईस, 90. सुभान खां। अमृतलाल नागर यहाँ लिखते है कि ‘‘देश की स्वाधीनता के लिए लड़ने वाले जितने नरशूरों के नाम-ठाम मिलते हैं, उतना ही इतिहास अंतरंग होता हैं;…‘‘अर्थात, इतिहास की एक खास विशेषता है, अपनी संरचना में उन व्यक्तियों का दस्तावेजीकरण करना जो देश की रक्षा करते हुए शहीद हो जाते हैं। यह राष्ट्रवाद की वही धारा है जिसकी उपस्थिति किसान अथवा ग्रामीण समाज में सबसे अधिक दिखलाई पड़ती है और इसका सबसे बड़ा कारण है कि उनका अपनी जमीन के प्रति गहरा लगाव होना! किसान अपनी जमीन का एक घूर तक किसी को नहीं देता हैं चाहे इसके लिए उसकी जान ही क्यों न चली जाए। यह ग्रामीण प्रतिरोध का एक बड़ा उदाहरण है।

 

वस्तुतः अमृतलाल नागर ने अपने लेखन के माध्यम से प्राचीन, मध्यकालीन और आधुनिक भारत का एक सामाजिक इतिहास प्रस्तुत किया है। इस इतिहास के केंद्र में वह भारतीय समाज है जिसका गाँव के साथ भी गहरा रिश्ता है। खासकर, करवट, पीढ़ियाँ, गदर के फूल आदि जैसी किताबें स्थानीय, ग्रामीण प्रतिरोध अथवा 1857 के इतिहास को समझने के लिए प्राथमिक स्रोत उपलब्ध कराती हैं। कई बार जब इतिहास की बड़ी-बड़ी पुस्तकें बंद दरवाजे नहीं खोल पाती हैं, तब ऐसे ही पुस्तकें सामने आकर इतिहास की धारा को पलट देती है। ग्रामीण इतिहास ऐसे ही संदर्भो से निर्मित होता है जहाँ लेखक मुख्यधारा से दूर लोक में मौजूद उन स्रोतों को इतिहास लेखन का आधार बनाता है जो समाज के अपने होते है तथा जिन्हें लोक सदियों से अपनी स्मृति और यथार्थ का हिस्सा बनाये हुए रहता हैं। अमृतलाल नागर का लेखन इसी प्रकार का है तथा यही कारण है कि उनका लेखन आज भी इतिहासकारों और समाजशास्त्रियों के लिए दिलचस्पी का विषय बना हुआ हैं।

(आजकल/अगस्त 2016)

 

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