बात उन दिनों की है जब शक्तिमान और रामायण धारावाहिक शुरू नहीं हुए थे. जब कम्प्यूटर भारत में नहीं आया था और न ही टीवी ने घरों में अपना बैनामा करवाया था. उन दिनों वामपंथ, समाजवाद, हिंदुवाद के बीच कांग्रेस पिस रही थी और इन सभी के बीच जनता. परसाई जी अपने बरामदे में खटिया अड़ाकर रेडियो पर समाचार सुन रहे थे कि वीपी सिंह और चंद्रशेखर में से कौन राजनीति का खिलाड़ी बनेगा. परसाई जी असमंजस में थे कि चंद्रशेखर के मन में अभी भी कांग्रेस है या जनता दल ने अपनी जगह बना ली है. वीपी सिंह तो ख़ैर सबकी समझ से परे थे. वो न तो कांग्रेसी बन पाते थे, न जनता दली और न ही वामपंथी. कभी-कभी ज्योति बसु की छवि में ऊहापोह की स्थिति थी लेकिन वीपी सिंह अभी भी छुपे हुए पत्ते थे.

 

परसाई जी बड़ी जिज्ञासा से समाचार को कान लगाए सुन रहे थे. अब उन्हें भी अपने व्यंग्य का मसाला चाहिए था और ऐसे दौर में वीपी बनाम चंद्रशेखर से बढ़कर भला क्या विषय हो सकता था? परसाई जी मन में ही व्यंग्य गढ़ रहे थे कि उनके पसंदीदा चंद्रशेखर मीटिंग-मीटिंग वाली राजनीति में थोड़ा पीछे रह गए और कमान वीपी सिंह के हाथ में चली गयी. परसाई जी निराश हुए. उन्हें लगा था कि उनकी तरह मुँहफट्ट आदमी देश की कमान सम्भालता तो भला क्या दिक़्क़त हो जाती! जो आदमी जनता के लिए जेल को घर बना लिया था, वो मीटिंग वाली राजनीति से कैसे जंग हार गया? परसाई जी के सवाल खुद उनसे ही जवाब पूछते थे.

 

परसाई जी ने ग़ुस्से में रात का भोजन नहीं किया. सुबह उठते ही वह फिर समाचार पर कुछ मसाला खोजने लगे लेकिन वही बासी-सा वातावरण शब्दों में गूंज रहा था. परसाई जी की आत्मा व्यथित हो चली थी. परसाई जी ने तय कर लिया था कि इस वीपी सिंह को व्यंग्य के बाण से समझाना होगा. वीपी सिंह के ख़िलाफ़ उन्होंने तीखा व्यंग्य लिखा – ‘व्यक्तिगत समाजवाद में डूबा वामपंथ.‘

 

हल्ला हो गया. वीपी सिंह तमतमाए हुए संदेशा भेजवा दिए कि इस तरह की अशोभनीय टिप्पणी प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ असहनीय है. परसाई जी ने दूत के हाथ एक चिट्ठी थमा दी और कहा ‘जाओ, वीपी सिंह को दे देना’. आवास पर चिट्ठी खुली तो दो पंक्ति लिखी थी – ‘वामपंथ से कांग्रेस मत की यात्रा मुबारक. चंद्र रूपी शेखर से मीटिंग में ही न जीता जाए’. आवास में सन्नाटा छा गया. वीपी सिंह ने परसाई जी पर मुक़दमा का आदेश दे दिया. आनन-फ़ानन में नोटिस जारी हुआ. नोटिस पहुँचने से पहले ही मुक़दमे की ख़बर पहुँच गयी. पूरे मुहल्ले में शोर मचा कि बड़के व्यंग्यकार फँस गए. अब चंद्रशेखर कहाँ से खोज-ख़बर लेने वाले है!

 

सुबह हुई तो पुलिस दरवाज़े पर आ धमकी. परसाई जी को बुलाया गया लेकिन कोई आवाज़ नहीं आयी. सब हैरान. सीना तान कर चलने वाला व्यंग्यकार यूँ दुबककर क्यों बैठा है? पुलिस ने कई बार आवाज़ लगाई लेकिन दरवाज़ा नहीं खुला. अंत में बड़े साहब ने दरवाज़ा तोड़ने को कहा. अधीनस्थों ने दो मिनट में आदेश पर अमल किया. दरवाज़ा अलग पड़ा था और परसाई जी का शरीर अलग. एक बेजान से मिट्टी के लोए के समान पड़े हुए परसाई जी के हाथ में कलम थी और मेज़ पर एक काग़ज़.

 

काग़ज़ में लिखा था –

“इस देश में दो देश हैं. एक उसका जो सारे नियम अपने हिसाब से लिखता है, अपने हिसाब से मनवाता है. एक देश उसका जो नियम समझने और मानने के ऊहापोह में फँस कर रह जाता है. यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सिर्फ़ उनके लिए है जो नेहरूकाल में लिखते थे. जिन्होंने नेहरू से लगाए पटेल तक को आयना दिखाया. ग़लत को ग़लत लिखने की हिम्मत की. आज एक नया देश है. इस देश के दूसरे देश वालों का. उनके लिए स्वतंत्रता अब जी-हुजूरी तक सीमित है. उनके द्वारा विरोध में लिखा हर एक लेख, व्यंग्य अब फूहड़, अश्लील या फिर अमर्यादित है. उस देश के निवासियों को इस व्यंग्यकार का अंतिम प्रणाम’

 

नोट – उपरोक्त लेख व्यंग्य है और इसमें लिखे सारे पात्र काल्पनिक हैं. अगर इसका वास्तविक जीवन से कोई संयोग होता है तो इसे संयोग ही समझा जाए.

 

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