नई दिल्ली से धनबाद की यात्रा पर हूँ| लोगों से बहुत सुना था कि झारखंड प्राकृतिक सौन्दर्य को अभी भी संवारे हुए है, इसलिए प्रकृति के इस नायाब करिश्मे और सुन्दरता को देखने का मन हुआ| बहुत सोचने के बाद तय किया कि भारतीय रेल से यात्रा की जाय क्यूंकि रेल की पटरियों के किनारे ही आपको आधी सुन्दरता का दर्शन हो जाएगा| तो फिर क्या था, मैं ठहरा महापंडित राहुल सांस्कृत्यायन का अनुयायी, चुनाव आते ही अम्बेडकरवाद में पगलाए मेरे देश के नेताओं और लेखकों से कहीं दूर….सैर कर दुनिया की गाफ़िल जिंदगानी फिर कहाँ….को महसूस करने…वास्तव में असली लेखक वही है जो प्रकृति और मानव विज्ञान में निहित प्रेम के दर्पण में खुद की मानवता का प्रतिबिम्ब उद्धृत कर ले| मैंने भी इसी परिपाटी को आगे बढाने की ठानी| मैंने भी सोचा क्यूँ न एक लेखक होने के नाते महापंडित राहुल सांस्कृत्यायन हो जाया जाय| अथाह सुख की अनुभूति है प्रकृति की बाहों में|

 

इसी बीच जब मेरे अंदर का मानव जाग जाता है तो मेरी निगाहें पास बैठे लोगों के पास पहुँच जाती है…कुछ लोग मस्त हवा के आनंद में इस कदर जन्म भर से थकाए है कि उंघ रहे है…कुछ दुसरे के कंधे पर सर मार कर सो रहे है और मैं एक बन्दर की तरह सब सुत्तक्कड़ो के बीच प्रकृति की सुन्दरता ही निहार रहा कर अघा रहा हूँ| भले ही ढंग से हिंदी न आती हो लेकिन सुबह होते ही सबके हाथ में टाइम्स ऑफ़ इंडिया, द हिन्दू और द टेलीग्राफ है| मेरे हाथ में सब अमर उजाला देख कर यूँ घुर रहे है जैसे मैं भारत में नहीं रूस के किसी ट्रेन के डिब्बे में बैठ कर हिंदी अखबार को सबकी निगाहों में चुभने के लिए खोल दिया हूँ| खैर ज्यादा पढ़े – लिखे लोग खतरनाक होते है इसलिए मैं अपनी निगाहों को फिलहाल अपने अखबार में ही समेट कर रखा हूँ| इसी बीच ट्रेन के बीच कुछ अतिसज्जन लोग घुस कर बोल रहे है कि “तनी खिसका हो, काहें इतना दूरे ले बैठल हवा, हमनो के तनी स जगह चाही मतलब चाही…बुझाइल|”

 

झारखण्ड की प्रकृतिक सुन्दरता उसके प्राकृतिक सम्पदा, लहलहाते हरे पेड़ों, छोटी-छोटी घासों से है जो पठारनुमा पहाड़ों पर दूर तक दिखती है और क्षितिज से पहले ओझल नही होती| माओवाद की शुरुआत भी इसी हेतु की गयी थी कि जो भी हो…विकास के नाम पर प्रकृति का बलात्कार नहीं होने देंगे| एसी में बैठ कर प्रकृति के लिए लडाई लड़ना आसान है पर जब इंसान उसी प्रकृति की रक्षा के लिए हथियार उठा ले तो वो माओवादी हो जाता है| हाँ ये भी सच है कि बाद में (वर्तमान में) ये आन्दोलन किसी और दिशा में चल दिया जिसके बाद…माओवाद की मूलभावना को माओवादियों ने ही दमन कर दिया|

 

अब गौर करने वाली बात है कि प्रकृति की रक्षा जैसे नेक काम में भी उन्हें हथियार क्यों उठाना पड़ा? कुछ तो बात होगी? कुछ लोगों से बात करके पता चला कि औद्योगिक माफियाओं और विकास के ठेकेदारों के पैसे के इशारे पर पुलिस द्वारा माओवाद से जुड़े लोगों और उनके परिवारों का उत्पीड़न जब चरम पर पहुँच गया तो उन्हें मजबूरी बस हथियार उठाना पड़ा| शेर के मुंह में खून लग जाने के बाद वो और खूंखार हो जाता है…ठीक वही हाल माओवादियों का हुआ…वो आन्दोलन की दिशा से भटक गए और हिंसा को जन्म देकर एक सोची समझी साजिश के तहत गुनाहगार हो गये|

 

मेरे हिसाब से माओवाद से जितना नुक्सान हुआ उससे कही ज्यादा फायदा हुआ है…प्राकृतिक सम्पदा के संरक्षण का| सरकारे करोड़ो, अरबों खर्च करके प्राकृतिक संपदा संरक्षण का ढोंग करती है और विकास के नाम पर प्राकृतिक जंगलों को काट कर कंकरीट के जंगल (‘कंकरीट के जंगल’ मेरे फेसबुक मित्र शम्भुनाथ शुक्ला जी के फेसबुक पृष्ठ से साभार) बसा दिया| इस जंगलों के बसने में औद्योगिक घरानों और गुंडागर्दी की राह पर बिल्डर बने लोगों का सबसे ज्यादा विकास हुआ| आम इंसान को तो बस धोखा मिला…और उनकी मानसिक तसल्ली हेतु इन कंकरीट के जंगलों में छोटे-छोटे पार्क बना दिए गये ताकि ज्यादा पढ़े-लिखे (मुर्ख) लोग बच्चों की भाँती इसमें सुबह-सुबह योग और व्यायाम करते हुए यही सोचे कि वो या तो कश्मीर की वादियों या तो हरियाली से परिपूर्ण खलिहानों या हरे-भरे जंगलों में बैठ कर प्राकृतिक हवा घोंट रहे है|

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