लगभग दो दशक यानि 1993 के बाद, देश के दो सबसे बड़े क्षेत्रीय दल अपने अस्तित्व को बचाने की कवायद में फिर से एक हो चले हैं| बसपा के संस्थापक कांशीराम और मुलायम सिंह यादव की दोस्ती जब परवान चढ़ी थी तो उस वक़्त मुलायम सिंह यादव द्वारा अस्तित्व में आई समाजवादी पार्टी उत्तरप्रदेश की राजनीति में पाँव ज़माने की कोशिश में लगी हुई थी| यह दौर जातिगत समीकरण को साधने का था| बसपा दलित और सपा अन्य पिछड़े वर्ग वोट बैंक को अपने खेमे में जोड़ने की राजनीतिक एवं कूटनीतिक दूरी बहुत ही सधे हुए कदमों से तय कर रही थी|

 

राममंदिर आन्दोलन और अडवाणी के रथ यात्रा ने उस वक़्त हिंदुत्व का ऐसा माहौल पैदा कर दिया कि जातिगत समीकरणों ने दम तोड़ना शुरू किया ही था कि इसी बीच सपा और बसपा ने एक साथ चुनाव लड़ने का ऐलान कर सभी को चौंका दिया था| गठबंधन के तहत यह तय हुआ कि सपा 256 और बसपा 164 विधानसभा सीट पर अपने उम्मीदवार खड़े करेगी| 1993 के विधानसभा चुनाव में सपा के 109 और बसपा के 67 विधायक विधानसभा पहुँचने में सफल हुए थे| गढ़बंधन के तहत दोनों दलों में यह भी तय हुआ था कि दोनों दलों के नेता आधा-आधा शासन काल मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान रहेंगे|

 

कांशीराम के बाद बसपा की कमान

 

कांशीराम के बाद बसपा की कमान संभालते ही मायावती और मुलायम सिंह यादव की राजनीतिक महत्वाकांक्षा ने गठबंधन में खटास पैदा करना शुरू कर दिया था| दोनों ही दल उत्तर प्रदेश की राजनीति में एकछत्र प्रभुत्व चाहते थे जो कि गठबंधन के मूलधर्म के बिलकुल विपरीत था| ऐसे में मई 1995 में बसपा ने मुलायम सिंह यादव की सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया| नतीजन सपा सरकार उस वक़्त अल्पमत में आ गयी| उसके बाद गेस्ट हाउस कांड और आपसी तल्ख़ राजनीति का वह दौर चला जिसके बीच उत्तरप्रदेश की राजनीति कभी भी दोनों दलों के शीर्ष नेताओं द्वारा मंच साझा करने की गवाह नहीं बनी|

 

अब जब फिर से हालत ऐसे है कि मोदी लहर के आगे कमजोर हो चुके विपक्ष ने एक साथ चुनाव लड़ने का फैसला तो किया है लेकिन कहीं न कहीं एक दशक से अधिक समय तक विधानसभा में एक दुसरे के धुर विरोधी दोनों ही दलों के शीर्ष नेता अभी भी डर के गठबंधन को ही ढोते हुए नज़र आ रहे हैं| उसी का परिणाम है कि उपचुनाव में बसपा सपा प्रत्याशी का समर्थन करेगी, इसकी घोषणा स्थानीय नेताओं से करायी गयी| उत्तरप्रदेश की राजनीति ने सिलसिलेवार गठबंधन को देखा है| सपा-बसपा, भाजपा-बसपा, कांग्रेस-बसपा, रालोद-कांग्रेस, सपा-कांग्रेस के असफल गठबंधन का मूलकारण ही देश की राजनीति के सबसे महत्वपूर्ण पायदान पर अपनी पैठ बनाने की ललक रही है और यह हमेशा से किसी भी सहयोगी दल को डर था कि कहीं गठबंधन को निभाते हुए उनके अपने वोट बैंक में ही सेंध न लग जाए|

दलों की बेचैनी

 

पूर्वोत्तर भारत में भाजपा की अप्रत्याशित जीत ने सभी दलों की बेचैनी बढ़ा दी है| लगभग ३० साल से ऊपर के वामपंथी किले को जिस तरह से एक ही झटके में भाजपा ने ध्वस्त किया है, सभी दल आपसी मंथन में लगे हुए हैं कि आखिर कैसे इस लहर का तोड़ निकाला जाय|

 

ऐसा होना स्वाभाविक भी है क्योंकि जिस तरह से बसपा का लोकसभा और विधानसभा चुनावों में प्रदर्शन रहा है, उस हिसाब से देखा जाय तो बसपा अपने अस्तित्व को समेटने में ही लगी हुई है| बसपा के लिए यह चिंतन का विषय है और गढ़बंधन मजबूरी भी है| सपा भी आपसी कलह से जूझती हुई नज़र आई थी इसीलिए सपा के मूल वोटरों ने ही दल से किनारा कर लिया और पारिवारिक घमासान के बीच भाजपा ने विधानसभा चुनावों में कहीं न कहीं दोनों ही दलों के मूल वोट बैंक में सेंध लगाकर इतिहास रच दिया|

 

उत्तरप्रदेश के राजनीतिक गठबंधन इतिहास में प्रत्येक दल अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को भी जीवित रखना चाहते हैं| ऐसे में यह गठबंधन कितने समय तक और कहाँ तक की दूरी एक साथ तय कर पायेगा, यह राजनीतिक पंडितों के लिए भी विश्लेषण का विषय है|

 

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2 Responses

  1. निह संदेह अपने अच्छा लेख दिया है! परन्तु जनताजनार्दन किस तरह से देखती है यह बिचार्डीय विषय है

    1. जनता ने अपना फ़ैसला भी सुना दिया और एक पार्टी को आयना भी दिखा दिया लेकिन सवाल अभी भी है कि क्या यह गठबंधन और आगे चल सकेगा?

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