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शहर – अरुण कमल

कोई शहर जब कोई एक का होता है तब वो शहर शहर नहीं होता उतरते हवाई जहाज से देखता हूं जब रौशनियों से खचाखच शहर
शहर - अरुण कमल

शहर - अरुण कमल | सांकेतिक चित्र

तब वो शहर शहर नहीं होता
उतरते हवाई जहाज से देखता हूं जब
रौशनियों से खचाखच शहर
तब लगता है एक बत्ती मेरे घर
की भी होगी कहीं टिमटिमाती,

और यह शहर मेरा भी है कुछ-कुछ
जिसे मैं उतना ही जानता हूं
जितना खून नसों को
और मुझे फख्र है यह शहर सिर्फ मेरा नहीं
फख्र है यहां किसी का हुक्म नहीं चलता
कोई हुक्म दे भी तो कोई मानने वाला नहीं
न फुटपाथों के बाशिंदे न खोमचे वाले
न सुबह-सुबह खून बेचते पसमांदा
न गंगा स्नान को जाती स्त्रियां
न रात भर जगकर जवान हुए लड़के-लड़कियां
शहर कोतवाल अगर खसखसी दाढ़ी लिए
निकल भी आए चौक पर तो कोई पहचानेगा नहीं,

और तो और गलियों के कुत्ते भूंकते-भूंकते
खदेड़ देंगे उसको शहर के बाहर अगर वो झुका भी
ढेला उठाने
मेरा शहर मेरा इंतजार कर रहा है
खुल रहा है हर दरवाजा किसी को पुकारता
हर दरवाजा एक इंतजार-
नदी भरी हो या सूखी जानती है मैं आऊंगा
उसके पास हर शाम तक-हार
मेरा शहर।

 

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साहित्य: 

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