ईदगाह – मुंशी प्रेमचंद

ईदगाह - मुंशी प्रेमचंद

रमजान के पूरे तीस रोजों के बाद ईद आयी है। कितना मनोहर, कितना सुहावना प्रभाव है। वृक्षों पर अजीब हरियाली है, खेतों में कुछ अजीब रौनक है, आसमान पर कुछ अजीब लालिमा है। आज का सूर्य देखो, कितना प्यारा, कितना शीतल है, यानी संसार को ईद की बधाई दे रहा है। गाँव में कितनी हलचल […]

पूस की रात – मुंशी प्रेमचंद

पूस की रात

हल्कू ने आकर स्त्री से कहा- सहना आया है, लाओ, जो रुपये रखे हैं, उसे दे दूँ, किसी तरह गला तो छूटे । मुन्नी झाड़ू लगा रही थी। पीछे फिरकर बोली- तीन ही तो रुपये हैं, दे दोगे तो कम्मल कहाँ से आवेगा ? माघ-पूस की रात हार में कैसे कटेगी ? उससे कह दो, […]

अलग्योझा – मुंशी प्रेमचंद

अलग्योझा - मुंशी प्रेमचंद

भोला महतो ने पहली स्त्री के मर जाने बाद दूसरी सगाई की तो उसके लड़के रग्घू के लिये बुरे दिन आ गये। रग्घू की उम्र उस समय केवल दस वर्ष की थी। चैन से गाँव में गुल्ली-डंडा खेलता फिरता था। माँ के आते ही चक्की में जुतना पड़ा। पन्ना रुपवती स्त्री थी और रुप और […]

हरिशंकर परसाई की आत्महत्या

हरिशंकर परसाई की आत्महत्या

  बात उन दिनों की है जब शक्तिमान और रामायण धारावाहिक शुरू नहीं हुए थे. जब कम्प्यूटर भारत में नहीं आया था और न ही टीवी ने घरों में अपना बैनामा करवाया था. उन दिनों वामपंथ, समाजवाद, हिंदुवाद के बीच कांग्रेस पिस रही थी और इन सभी के बीच जनता. परसाई जी अपने बरामदे में […]

हिंदू मां का मुस्लिम बेटा हरिद्वार से लौटा है

हिंदू मां का मुस्लिम बेटा हरिद्वार से लौटा है

यह कहानी काल्पनिक नहीं है। यह कहानी राजस्थान के नीमकाथाना की है, जिसके पड़ोसी राज्य से शुरू हुआ नफरत और बंटवारे का कारोबार आज पूरे देश को त्रस्त किये हुए है।

नागरिकता संशोधन विधेयक

नागरिकता संशोधन विधेयक

लोकसभा में नागरिकता संशोधन विधेयक पर बहस के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह ने यों तो बड़ा ओजस्वी और तार्किक भाषण दिया, किंतु उनके समक्ष कुछ प्रश्न प्रस्तुत हैं। आश्चर्य की बात है कि ये प्रश्न उनके विरोधियों ने नहीं उनके समर्थकों ने प्रस्तुत किए हैं।

प्रेम – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

प्रेम – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

उमंगों भरा दिल किसी का न टूटे। पलट जायँ पासे मगर जुग न फूटे। कभी संग निज संगियों का न छूटे। हमारा चलन घर हमारा न लूटे। सगों से सगे कर न लेवें किनारा। फटे दिल मगर घर न फूटे हमारा।1। कभी प्रेम के रंग में हम रँगे थे। उसी के अछूते रसों में पगे […]

शहर – अरुण कमल

शहर - अरुण कमल

कोई शहर जब कोई एक का होता है

तब वो शहर शहर नहीं होता
उतरते हवाई जहाज से देखता हूं जब
रौशनियों से खचाखच शहर

भूले-बिसरे रचनाकार : अरुण कमल

अरुण कमल

अरुण कमल का वास्तविक नाम ‘अरुण कुमार’ है। साहित्यिक लेखन के लिए उन्होंने ‘अरुण कमल’ नाम अपनाया और यही नाम उनकी स्वाभाविक पहचान बन गया है। उनका जन्म 15 फरवरी 1954 ई० को बिहार के रोहतास जिले के नासरीगंज में हुआ था। पेशे से वे पटना विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग में प्राध्यापक हैं।

नहान – अरुण प्रकाश

नहान - अरुण प्रकाश

मैं जब उस मकान में नया पड़ोसी बना तो मकान मालिक ने हिदायत दी थी – “ बस तुम नहान से बच कर रहना। उसके मुंह नहीं लगना। कुछ भी बोले तो ज़ुबान मत खोलना। नहान ज़ुबान की तेज़ है। इस मकान में कोई १८ सालों से रहती है। उसे नहाने की बीमारी है। सवेरे, […]

विकल्प – अज्ञेय

विकल्प - अज्ञेय

वेदी तेरी पर माँ, हम क्या शीश नवाएँ? तेरे चरणों पर माँ, हम क्या फूल चढ़ाएँ? हाथों में है खड्ग हमारे, लौह-मुकुट है सिर पर- पूजा को ठहरें या समर-क्षेत्र को जाएँ? मन्दिर तेरे में माँ, हम क्या दीप जगाएँ? कैसे तेरी प्रतिमा की हम ज्योति बढ़ाएँ? शत्रु रक्त की प्यासी है यह ढाल हमारी […]

हिंदी साहित्य का इतिहास प्रथम संस्करण का वक्तव्य – आचार्य रामचन्द्र शुक्ल

Hindi Sahitya ka Itihaas

हिंदी साहित्य के 900 वर्षों के इतिहास को चार कालों में विभक्त कर सकते हैं–

आदिकाल (वीरगाथाकाल, संवत् 1050-1375)
पूर्व मध्यकाल (भक्तिकाल, संवत् 1375-1700)
उत्तर मध्यकाल (रीतिकाल, संवत् 1700-1900)
आधुनिक काल (गद्यकाल, संवत् 1900-1984)