जो भी कमज़ोर हैं मुश्किलों में हैं सब

जो भी कमज़ोर हैं मुश्किलों में हैं सब

जो भी कमज़ोर हैं मुश्किलों में हैं सब सियासतदारों ने तो मुँह हैं उधर कर लिया किससे बोले अब हम किसको बताएँ ये सब दिलों के कोनों में सियासत ने ज़हर भर दिया काफी मुद्दत से जो न हम कह सके उससे हमको ही उसने बेख़बर कर दिया अब लिखते हैं तो कम पढ़तें हैं […]

प्रेम – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

प्रेम – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

उमंगों भरा दिल किसी का न टूटे। पलट जायँ पासे मगर जुग न फूटे। कभी संग निज संगियों का न छूटे। हमारा चलन घर हमारा न लूटे। सगों से सगे कर न लेवें किनारा। फटे दिल मगर घर न फूटे हमारा।1। कभी प्रेम के रंग में हम रँगे थे। उसी के अछूते रसों में पगे […]

शहर – अरुण कमल

शहर - अरुण कमल

कोई शहर जब कोई एक का होता है

तब वो शहर शहर नहीं होता
उतरते हवाई जहाज से देखता हूं जब
रौशनियों से खचाखच शहर

विकल्प – अज्ञेय

विकल्प - अज्ञेय

वेदी तेरी पर माँ, हम क्या शीश नवाएँ? तेरे चरणों पर माँ, हम क्या फूल चढ़ाएँ? हाथों में है खड्ग हमारे, लौह-मुकुट है सिर पर- पूजा को ठहरें या समर-क्षेत्र को जाएँ? मन्दिर तेरे में माँ, हम क्या दीप जगाएँ? कैसे तेरी प्रतिमा की हम ज्योति बढ़ाएँ? शत्रु रक्त की प्यासी है यह ढाल हमारी […]

है नमन उनको – कुमार विश्वास

है नमन उनको कि जो देह को अमरत्व देकर इस जगत में शौर्य की जीवित कहानी हो गये हैं

है नमन उनको कि जो देह को अमरत्व देकर इस जगत में शौर्य की जीवित कहानी हो गये हैं है नमन उनको कि जिनके सामने बौना हिमालय जो धरा पर गिर पड़े पर आसमानी हो गये हैं पिता जिनके रक्त ने उज्जवल किया कुलवंश माथा मां वही जो दूध से इस देश की रज तौल […]

देह की अनन्त यात्रा – डॉ. चित्रलेखा अंशु

ये भी एक माध्यम है मेरी देह की अनन्त यात्रा को मापने के लिए।

ये जो काले रंग का कुर्ता है उसे कभी फेंकती नहीं मैं न तो किसी को देती हूँ। ये भी एक माध्यम है मेरी देह की अनन्त यात्रा को मापने के लिए। जो कभी शंकु हुआ करता था ये कुर्ता सी समय से आधार है, तय करने को मेरी देह रचना जो अब शंकु से […]

भगवान अगले जन्म मुझे बेटी न बनाना

भगवान अगले जन्म मुझे बेटी न बनाना

भगवान अगले जन्म मुझे बेटी ना बनाना भगवान अगले जन्म मुझे बेटी ना बनाना कुछ अपने घरों में हर साल कन्या पूजन करवाते हैं कुछ बेदर्दी कोख में बेटी मारने की दूकान चलाते हैं क्यों बेटों की चाह को हम, मन में पालते हैं? अपनी बेटियों को क्यों नही हम संभालते हैं? क्या बेटी होना […]

जाग तुझको दूर जाना है – महादेवी वर्मा

चिर सजग आँखें उनींदी आज कैसा व्यस्त बाना! जाग तुझको दूर जाना!

  चिर सजग आँखें उनींदी आज कैसा व्यस्त बाना! जाग तुझको दूर जाना! अचल हिमगिरि के हॄदय में आज चाहे कम्प हो ले! या प्रलय के आँसुओं में मौन अलसित व्योम रो ले; आज पी आलोक को ड़ोले तिमिर की घोर छाया जाग या विद्युत शिखाओं में निठुर तूफान बोले! पर तुझे है नाश पथ […]

मेरी भाषा के लोग – केदारनाथ सिंह

मेरी भाषा के लोग – केदारनाथ सिंह

मेरी भाषा के लोग मेरी सड़क के लोग हैं सड़क के लोग सारी दुनिया के लोग पिछली रात मैंने एक सपना देखा कि दुनिया के सारे लोग एक बस में बैठे हैं और हिन्दी बोल रहे हैं फिर वह पीली-सी बस हवा में गायब हो गई और मेरे पास बच गई सिर्फ़ मेरी हिन्दी जो […]

मेरे देश की आँखें – अज्ञेय

मेरे देश की आँखें - अज्ञेय

  नहीं, ये मेरे देश की आँखें नहीं हैं पुते गालों के ऊपर नकली भवों के नीचे छाया प्यार के छलावे बिछाती मुकुर से उठाई हुई मुस्कान मुस्कुराती ये आँखें – नहीं, ये मेरे देश की नहीं हैं… तनाव से झुर्रियाँ पड़ी कोरों की दरार से शरारे छोड़ती घृणा से सिकुड़ी पुतलियाँ – नहीं, ये […]

क्या किया आजतक क्या पाया – हरिशंकर परसाई

क्या किया आजतक क्या पाया

मैं सोच रहा, सिर पर अपार दिन, मास, वर्ष का धरे भार पल, प्रतिपल का अंबार लगा आखिर पाया तो क्या पाया? जब तान छिड़ी, मैं बोल उठा जब थाप पड़ी, पग डोल उठा औरों के स्वर में स्वर भर कर अब तक गाया तो क्या गाया? सब लुटा विश्व को रंक हुआ रीता तब […]

लो दिन बीता लो रात गयी – हरिवंश राय बच्चन

harivansh rai bachchan

सूरज ढल कर पच्छिम पंहुचा, डूबा, संध्या आई, छाई, सौ संध्या सी वह संध्या थी, क्यों उठते-उठते सोचा था दिन में होगी कुछ बात नई लो दिन बीता, लो रात गई धीमे-धीमे तारे निकले, धीरे-धीरे नभ में फ़ैले, सौ रजनी सी वह रजनी थी, क्यों संध्या को यह सोचा था, निशि में होगी कुछ बात […]