Category: कविता

Posted on: December 25, 2022 Posted by: लिटरेचर इन इंडिया Comments: 0

सूरज की पेशी – कन्हैया लाल नंदन

आँखों में रंगीन नज़ारे सपने बड़े-बड़े भरी धार लगता है जैसे बालू बीच खड़े। बहके हुए समंदर मन के ज्वार निकाल रहे दरकी हुई शिलाओं में खारापन डाल रहे मूल्य पड़े हैं बिखरे जैसे शीशे के टुकड़े! नजरों के ओछेपन जब इतिहास रचाते हैं पिटे हुए मोहरे पन्ना-पन्ना भर जाते हैं बैठाए जाते हैं सच्चों पर पहरे तगड़े। अंधकार की पंचायत में सूरज की पेशी किरणें ऐसे करें गवाही जैसे…

Posted on: December 25, 2022 Posted by: लिटरेचर इन इंडिया Comments: 0

नदी की कहानी – कन्हैया लाल नंदन

नदी की कहानी कभी फिर सुनाना, मैं प्यासा हूँ दो घूँट पानी पिलाना। मुझे वो मिलेगा ये मुझ को यकीं है बड़ा जानलेवा है ये दरमियाना मुहब्बत का अंजाम हरदम यही था भँवर देखना कूदना डूब जाना। अभी मुझ से फिर आप से फिर किसी से मियाँ ये मुहब्बत है या कारखाना। ये तन्हाईयाँ, याद भी, चांदनी भी, गज़ब का वज़न है सम्भल के उठाना। अगर आप भी लिखते है…

Posted on: June 13, 2020 Posted by: दीपक सिंह Comments: 0

जो भी कमज़ोर हैं मुश्किलों में हैं सब

जो भी कमज़ोर हैं मुश्किलों में हैं सब सियासतदारों ने तो मुँह हैं उधर कर लिया किससे बोले अब हम किसको बताएँ ये सब दिलों के कोनों में सियासत ने ज़हर भर दिया काफी मुद्दत से जो न हम कह सके उससे हमको ही उसने बेख़बर कर दिया अब लिखते हैं तो कम पढ़तें हैं लोग हवा के झोकों ने बेफिकर कर दिया कोई बताये ये जाकर उनसे कभी रात…

Posted on: November 22, 2019 Posted by: लिटरेचर इन इंडिया Comments: 0

प्रेम – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

उमंगों भरा दिल किसी का न टूटे। पलट जायँ पासे मगर जुग न फूटे। कभी संग निज संगियों का न छूटे। हमारा चलन घर हमारा न लूटे। सगों से सगे कर न लेवें किनारा। फटे दिल मगर घर न फूटे हमारा।1। कभी प्रेम के रंग में हम रँगे थे। उसी के अछूते रसों में पगे थे। उसी के लगाये हितों में लगे थे। सभी के हितू थे सभी के सगे…

Posted on: November 18, 2019 Posted by: लिटरेचर इन इंडिया Comments: 0

विकल्प – अज्ञेय

वेदी तेरी पर माँ, हम क्या शीश नवाएँ? तेरे चरणों पर माँ, हम क्या फूल चढ़ाएँ? हाथों में है खड्ग हमारे, लौह-मुकुट है सिर पर- पूजा को ठहरें या समर-क्षेत्र को जाएँ? मन्दिर तेरे में माँ, हम क्या दीप जगाएँ? कैसे तेरी प्रतिमा की हम ज्योति बढ़ाएँ? शत्रु रक्त की प्यासी है यह ढाल हमारी दीपक- आरति को ठहरें या रण-प्रांगण में जाएँ? – दिल्ली जेल, सितम्बर, 1931 विकल्प –…

Posted on: August 15, 2019 Posted by: लिटरेचर इन इंडिया Comments: 0

है नमन उनको – कुमार विश्वास

है नमन उनको कि जो देह को अमरत्व देकर इस जगत में शौर्य की जीवित कहानी हो गये हैं है नमन उनको कि जिनके सामने बौना हिमालय जो धरा पर गिर पड़े पर आसमानी हो गये हैं पिता जिनके रक्त ने उज्जवल किया कुलवंश माथा मां वही जो दूध से इस देश की रज तौल आई बहन जिसने सावनों में हर लिया पतझर स्वयं ही हाथ ना उलझें कलाई से…

Posted on: June 22, 2019 Posted by: लिटरेचर इन इंडिया Comments: 2

देह की अनन्त यात्रा – डॉ. चित्रलेखा अंशु

ये जो काले रंग का कुर्ता है उसे कभी फेंकती नहीं मैं न तो किसी को देती हूँ। ये भी एक माध्यम है मेरी देह की अनन्त यात्रा को मापने के लिए। जो कभी शंकु हुआ करता था ये कुर्ता सी समय से आधार है, तय करने को मेरी देह रचना जो अब शंकु से दीर्घाकार हो चली है। देह अपनी रचना बदलती है। मन अक्षुण्ण ही रह जाता है।…

Posted on: January 22, 2015 Posted by: लिटरेचर इन इंडिया Comments: 0

भगवान अगले जन्म मुझे बेटी न बनाना

भगवान अगले जन्म मुझे बेटी ना बनाना भगवान अगले जन्म मुझे बेटी ना बनाना कुछ अपने घरों में हर साल कन्या पूजन करवाते हैं कुछ बेदर्दी कोख में बेटी मारने की दूकान चलाते हैं क्यों बेटों की चाह को हम, मन में पालते हैं? अपनी बेटियों को क्यों नही हम संभालते हैं? क्या बेटी होना पाप है? कोई मुझे समझाना भगवान् अगले जन्म मुझे बेटी ना बनाना भगवान् अगले जन्म…

Posted on: January 22, 2015 Posted by: लिटरेचर इन इंडिया Comments: 0

जाग तुझको दूर जाना है – महादेवी वर्मा

चिर सजग आँखें उनींदी आज कैसा व्यस्त बाना! जाग तुझको दूर जाना! अचल हिमगिरि के हॄदय में आज चाहे कम्प हो ले! या प्रलय के आँसुओं में मौन अलसित व्योम रो ले; आज पी आलोक को ड़ोले तिमिर की घोर छाया जाग या विद्युत शिखाओं में निठुर तूफान बोले! पर तुझे है नाश पथ पर चिन्ह अपने छोड़ आना! जाग तुझको दूर जाना! बाँध लेंगे क्या तुझे यह मोम…

Posted on: January 22, 2015 Posted by: लिटरेचर इन इंडिया Comments: 0

मेरी भाषा के लोग – केदारनाथ सिंह

मेरी भाषा के लोग मेरी सड़क के लोग हैं सड़क के लोग सारी दुनिया के लोग पिछली रात मैंने एक सपना देखा कि दुनिया के सारे लोग एक बस में बैठे हैं और हिन्दी बोल रहे हैं फिर वह पीली-सी बस हवा में गायब हो गई और मेरे पास बच गई सिर्फ़ मेरी हिन्दी जो अन्तिम सिक्के की तरह हमेशा बच जाती है मेरे पास हर मुश्किल में कहती वह…

Posted on: January 22, 2015 Posted by: लिटरेचर इन इंडिया Comments: 0

मेरे देश की आँखें – अज्ञेय

नहीं, ये मेरे देश की आँखें नहीं हैं पुते गालों के ऊपर नकली भवों के नीचे छाया प्यार के छलावे बिछाती मुकुर से उठाई हुई मुस्कान मुस्कुराती ये आँखें – नहीं, ये मेरे देश की नहीं हैं… तनाव से झुर्रियाँ पड़ी कोरों की दरार से शरारे छोड़ती घृणा से सिकुड़ी पुतलियाँ – नहीं, ये मेरे देश की आँखें नहीं हैं… वन डालियों के बीच से चौंकी अनपहचानी कभी झाँकती…